हम यादों को सीने वाले इक दर्ज़ी शायर हैं
मन-मर्ज़ी से लिखने वाले इक फ़र्ज़ी शायर हैं
इन लफ़्ज़ों को माँग कहें हम हाले-दिल अपना जो
इन शब्दों के बोझ तले हम इक कर्ज़ी शायर हैं
कुछ जज़्बातों को बातों में ढलने की ख़्वाहिश थी
सो नैनों के जल की आई इक अर्ज़ी शायर हैं
यूँँ तो दिन भी अच्छा है पर झूठा सा लगता है
हम रखने वाले रातों से ख़ुद-गर्ज़ी शायर हैं
तू गर मिल जाता तो लिखना छोड़ चुके होते हम
ये दर्दे-दिल लिखवाना रब की मर्ज़ी शायर हैं
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