हम यादों को सीने वाले इक दर्ज़ी शाइ'र हैं
मन-मर्ज़ी से लिखने वाले इक फ़र्ज़ी शाइ'र हैं
इन लफ़्ज़ों को माँग कहें हम हाल-ए-दिल अपना जो
इन शब्दों के बोझ तले हम इक कर्ज़ी शाइ'र हैं
कुछ जज़्बातों को बातों में ढलने की ख़्वाहिश थी
सो नैनों के जल की आई इक अर्ज़ी शाइ'र हैं
यूँ तो दिन भी अच्छा है पर झूठा सा लगता है
हम रखने वाले रातों से ख़ुद-गर्ज़ी शाइ'र हैं
तू गर मिल जाता तो लिखना छोड़ चुके होते हम
ये दर्द-ए-दिल लिखवाना रब की मर्ज़ी शाइ'र हैं
— Sarvjeet Singh















