किसी कमज़र्फ़ का एहसान मेरा मसअला है

  - Shahid Zaki

किसी कमज़र्फ़ का एहसान मेरा मसअला है
अब चढ़ाई नहीं ढलवान मेरा मसअला है

ला तेरे सारे गुनाह अपनी जबीं पर लिख लूँ
छोड़ ईमान को ईमान मेरा मसअला है

मुझ को मुर्दों नहीं मर्दों की तरह देखिएगा
मैं जो ज़िंदा हूँ तो ज़िन्दान मेरा मसअला है

मेरी कोशिश है कि मैं ख़ुद से रिहा हो जाऊँ
तुम समझते हो कि निर्वान मेरा मसअला है

ख़ुद को तरतीब से रखते हुए रुक जाता हूँ
मुझ में ठहरा हुआ तूफ़ान मेरा मसअला है

मैं कि बर्बाद भी आबाद नज़र आता हूँ
नज़र आता हूँ कि पहचान मेरा मसअला है

कश्मकश हो तो मक़ामात बदल जाते हैं
यानी अब मुझ से परेशान मेरा मसअला है

जिस जगह कुछ नहीं सब कुछ है वहीं पर 'शाहिद'
अदम इमकान में इमकान मेरा मसअला है

  - Shahid Zaki

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