राज़ अंदर ही समोता तो समुंदर होता
दिल कोई रोज़ न रोता तो समुंदर होता
तेरी ज़िद ने तुझे तालाब बना रक्खा है
तू मेरे पाँव भिगोता तो समुंदर होता
मैं वो दरिया हूँ जो आहिस्ता-रवी में सूखा
मैं अगर सुस्त न होता तो समुंदर होता
कर गई झील मुझे अम्न पसंदी मेरी
बस्तियाँ में भी डुबोता तो समुंदर होता
हार कर चश्मा-ए-ख़्वाबीदा तह-ए-संग-ए-कराँ
और कुछ देर न सोता तो समुंदर होता
ये बगोले ये मद-ओ-जज़्र मेरी मिट्टी का
मैं अगर दश्त न होता तो समुंदर होता
आब-ए-शफ़्फ़ाफ़ लिए ये जो कुआँ है 'शाहिद'
दाग़ दो-चार के धोता तो समुंदर होता
As you were reading Shayari by Shahid Zaki
our suggestion based on Shahid Zaki
As you were reading undefined Shayari