bichhad gaya tha koi khwaab-e-dil-nasheen mujh se | बिछड़ गया था कोई ख़्वाब-ए-दिल-नशीं मुझ से

  - Shahid Zaki

बिछड़ गया था कोई ख़्वाब-ए-दिल-नशीं मुझ से
बहुत दिनों मिरी आँखें जुदा रहीं मुझ से

मैं साँस तक नहीं लेता पराई ख़ुशबू में
झिझक रही है यूँँही शाख़-ए-यासमीं मुझ से

मिरे गुनाह की मुझ को सज़ा नहीं देता
मिरा ख़ुदा कहीं नाराज़ तो नहीं मुझ से

ये शाहकार किसी ज़िद का शाख़साना है
उलझ रहा था बहुत नक़्श-ए-अव्वलीं मुझ से

मैं तख़्त पर हूँ मगर यूँँ तो ख़ाक-ज़ादा ही
गुरेज़ करते हैं क्यूँँ बोरिया-नशीं मुझ से

उजड़ उजड़ के बसे हैं मिरे दर-ओ-दीवार
बिछड़ बिछड़ के मिले हैं मिरे मकीं मुझ से

बिखर रही है तप-ए-इंतिक़ाम से मिरी ख़ाक
गुज़र रही है कोई मौज-ए-आतिशीं मुझ से

मुहाल है कि तमाशा तमाम हो 'शाहिद'
तमाश-बीन से मैं ख़ुश तमाश-बीं मुझ से

  - Shahid Zaki

Anjam Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Shahid Zaki

As you were reading Shayari by Shahid Zaki

Similar Writers

our suggestion based on Shahid Zaki

Similar Moods

As you were reading Anjam Shayari Shayari