दिलों में फूल खिलते जा रहे हैं
मिरे क़ासिद बजा फ़रमा रहे हैं
हमें तो और भी ग़म खा रहे हैं
मुक़ाबिल आप भी धमका रहे हैं
हुई है रौशनी से जब से अन-बन
अँधेरे रास्ता दिखला रहे हैं
अकेले दूर जाकर रो लिए हम
अकेले ख़ुद को ही बहला रहे हैं
अब अपनी ज़िन्दगी से तंग आकर
हम अपनी मौत पर इतरा रहे हैं
हमारा जिस्म है इक क़ब्र जैसा
बहुत कुछ जिस में हम दफ़ना रहे हैं
कोई अपना नहीं है यार सोहिल
हम अपने आप से बतला रहे हैं
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