बड़ी अच्छी लगी आदत तुम्हारी
बदलना पर नहीं फ़ितरत हमारी
चलाए तीर तुम ने दिल पे ऐसे
कि घाइल हो गए जो थे शिकारी
कभी रोया, कभी सोया नहीं मैं
सितारे गिन कभी रातें गुज़ारी
बहुत एहसान हैं मुझ पर तुम्हारे
बहुत जल्दी चुका दूँगा उधारी
नहीं चलता कभी जो दाव कोई
वही है अस्ल में असली जुआरी
मोहब्बत थी तभी तो चुप रहा मैं
मुझे आती नहीं क्या होशियारी
— Shashank Shekhar Pathak















