जिस को पा के लगी ज़िन्दगी ज़िन्दगी

खो के उस को मिलेगी कभी क्या ख़ुशी

तुम को देखूँ कि बस देखता ही रहूँ
देख कर के तुम्हें जैसे दुनिया मिली

तुम से भी झूठ कहना पड़ा भीड़ में
अब नहीं याद आती किसी की कभी

जीस्त में जिस के अपना नहीं कुछ रहा
बस उसी की हमें याद आती रही

तोड़ दो बेड़ियाँ गर ज़रूरी न हो
बोझ दिल पे रहे है ये कितना सही

लिख रहा तेरे होंठों पे कोरी ग़ज़ल
तू हर इक शय में ही याद आती रही

हुस्न पे सादगी का है अपना असर
ले के डूबी है कितनों को ये सादगी

— Umesh Maurya

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