चलो देर से ही सही मगर मैं निकल गया हूँ गुमान सेमुझे हीरे मोती की चाह थी किसी कोयले की खदान सेमैं अमाँ परस्त था और वो था अमीर नफ़रत-ओ-ज़ुल्म कामुझे ख़ुशबुओं से लगाव था उसे ख़ंजरों की दुकान से— Abdul Rahman "Vaahid"