Aadil Rahi

Aadil Rahi

@AadilRahi

Aadil Rahi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Aadil Rahi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तुम मेरा नाम-ओ-नसब पूछ रहे हो सब सेे इश्क़ हो जाए तो शिजरा नहीं देखा जाता — Aadil Rahi
रो रो के सोना तो हँस हँस के उठना हम ऐसे न थे दिल लगाने से पहले — Aadil Rahi
तुम्हारे बा'द ये ग़म भी उठाना पड़ता है ख़ुशी मिले न मिले मुस्कुराना पड़ता है — Aadil Rahi
बदनाम कर दिया है तेरे झूठे इश्क़ ने अब सोचता हूँ मुझ सेे मोहब्बत करेगा कौन — Aadil Rahi
उम्र भर उन से तअल्लुक़ नहीं टूटा करता ऐसे कुछ लोग हैं जो दिल में उतर जाते हैं — Aadil Rahi
कहा तू ने तो एक पल में ये हसरत छोड़ दी हम ने तेरी ख़ातिर मोहब्बत की मोहब्बत छोड़ दी हम ने — Aadil Rahi
जा तेरे दिल की तमन्ना का भरम रखते हैं तेरी हसरत है तो फिर तुझ को भुला देते हैं — Aadil Rahi

Ghazal

मैं न कहता था मिरे यार बदल जाता है वक़्त कितना भी हो दुश्वार बदल जाता है मैं ने बस दिल की सुनी वर्ना तिरे बारे में लोग कहते थे ख़बर-दार बदल जाता है हाकिम-ए-वक़्त यूँँ मग़रूर न बन होश में आ पीर आता है तो इतवार बदल जाता है तुझ पे कैसे हो यक़ीं मुझ को कि अब तू यकसर अपना कहता तो है हर बार बदल जाता है ये नज़ाकत ये दिखावा ये तकब्बुर अच्छा या'नी दौलत से भी मेआ'र बदल जाता है देखने वालो हक़ारत से न देखो मुझ को भूख से जिस्म का आकार बदल जाता है क्या बताऊँ कि मोहब्बत के सफ़र में राही ग़म तो रह जाता है ग़म-ख़्वार बदल जाता है — Aadil Rahi
गर्द जम जाए तो शीशा नहीं देखा जाता या'नी तस्वीर को धुँदला नहीं देखा जाता तिश्नगी आ तुझे दरिया के हवाले कर दूँ तुझ को इस हाल में प्यासा नहीं देखा जाता तुम मिरा नाम-ओ-नसब पूछ रहे हो सब से इश्क़ हो जाए तो शजरा नहीं देखा जाता लौट आने की तसल्ली तिरी झूटी ही सही अब तो मुड़-मुड़ के यूँँ रस्ता नहीं देखा जाता शे'र अच्छे जो बुरे लगते हैं दुनिया को मिरे हो ग़ज़ल में तिरा चर्चा नहीं देखा जाता लोग मिलते हैं बिछड़ते हैं मगर क्यूँ मुझ से यूँँ तिरा छोड़ के जाना नहीं देखा जाता इज़्ज़-ओ-तौक़ीर का ये हाल हसद में हम से क़द किसी का भी हो ऊँचा नहीं देखा जाता — Aadil Rahi
कसक दिल की मिटाने में ज़रा सी देर लगती है किसी का ग़म भुलाने में ज़रा सी देर लगती है किसी को चाह कर अपना बनाना ठीक है लेकिन मोहब्बत आज़माने में ज़रा सी देर लगती है तुम्हें पाने की ख़्वाहिश में हुआ एहसास ये मुझ को मुक़द्दर आज़माने में ज़रा सी देर लगती है जिसे मिन्नत मुरादों से बड़ी मुश्किल से पाया हो उसे दिल से भुलाने में ज़रा सी देर लगती है कि जिस दिल की ज़मीं बरसों से बंजर हो तो फिर उस पर नई चाहत उगाने में ज़रा सी देर लगती है ग़ज़ल पढ़ कर तो आसानी से महफ़िल लूट सकते हो मगर इज़्ज़त कमाने में ज़रा सी देर लगती है दिल-ए-मुज़्तर को आख़िर कौन समझाएगा ऐ 'राही' सुकून-ए-क़ल्ब पाने में ज़रा सी देर लगती है — Aadil Rahi
उसे तुम से मोहब्बत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना ये बस दिल की शरारत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना तुम्हीं को देख कर वो मुस्कुराता है तो हैरत क्या उसे हँसने की आदत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना हुए बर्बाद तो अब आह-ओ-ज़ारी कर रहे हो तुम कहा भी था सियासत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना मैं तुझ को चाहता हूँ बात ये सच है मगर फिर भी मुझे तेरी ज़रूरत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना ही झुकी नज़रों से तकना और ख़मोशी से गुज़र जाना मोहब्बत की रिवायत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना किया करता हूँ 'राही' उस की ता'रीफ़ें सबब ये है वो मुझ से ख़ूब-सूरत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना — Aadil Rahi