पीते हैं क्यूँ शराब यहाँ लोग क्या पता
ढूँढूँगा मैं जवाब ला मुझ को शराब दे
बे-शक ग़म-ओ-ख़ुशी में निभाती हो साथ पर
मय चीज़ है ख़राब ला मुझ को शराब दे
क्या क्या गँवा दिया है मियाँ इस शराब में
रक्खा नहीं हिसाब ला मुझ को शराब दे
रहता हूँ गर मैं होश में तो भूलता नहीं
चेहरा वो माहताब ला मुझ को शराब दे
मुझ से तो एक इश्क़ भी पूरा न हो सका
जीना हुआ अज़ाब ला मुझ को शराब दे
मेरी किताब-ए-ज़ीस्त में ख़ुशियाँ थीं जिस जगह
ख़ाली रहा वो बाब ला मुझ को शराब दे
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निगाहें आप की क़ातिल हैं और प्यारी भी
शिकार हो गया ख़ुद देख कर शिकारी भी
शिकार हो गया ख़ुद देख कर शिकारी भी
नचा रही है इशारों पे अपने दुनिया को
खुला ये राज़ के है ज़िंदगी मदारी भी
यही है डर के वो सुन कर ख़फ़ा न हो जाए
उसी से प्यार है हम को, उसी से यारी भी
उसे ही भूल गए इंतिज़ार जिस का था
कभी-कभार तो ऐसी रही ख़ुमारी भी
ज़रा सी देर में करता है दिल क़यास कई
अजीब चीज़ है ऐ दोस्त बे-क़रारी भी
अभी ख़मोश है तू देख कर सितम मुझ पर
कर इंतिज़ार के आएगी तेरी बारी भी
वो एक क़िस्सा कहानी न बन सका “नीरज”
के मुख़्तसर ही रही दास्ताँ हमारी भी
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अदा मोहब्बत हया मोहब्बत हँसी मोहब्बत नज़र मोहब्बत
मैं जिस की यादों में मुब्तिला हूँ वो शोख़ है सर-ब-सर मोहब्बत
मैं जिस की यादों में मुब्तिला हूँ वो शोख़ है सर-ब-सर मोहब्बत
अभी मोहब्बत की इब्तिदा है हर एक मंज़र हसीं लगेगा
हमारे जैसी ही होगी हालत करेगी जिस दिन असर मोहब्बत
करो मोहब्बत की बात हम से न दुनियादारी सिखाओ हम को
हो जाए बे-शक ख़िलाफ़ दुनिया हम उस तरफ़ हैं जिधर मोहब्बत
सभी की नज़रों से बच रहे हो मगर हक़ीक़त भी जान लो तुम
छुपाओ कितना भी इस को लेकिन छपेगी बनकर ख़बर मोहब्बत
ये ज़िंदगी वो सफ़र है जिस
में हमें है दरिया के पार जाना
मगर किनारों के दरमियाँ है ये दिल की कश्ती, भँवर मोहब्बत
ये प्यार है दिल-लगी नहीं है यक़ीन कर लो यक़ीन कर लो
वगरना तुम भी यही कहोगे हुई तुम्हें भी अगर मोहब्बत
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दोनों हैं अपनी ही धुन में पागल से
प्यार हुआ है सहरा को इक बादल से
प्यार हुआ है सहरा को इक बादल से
चेहरा अबरू आँखें लब तो क्या कहिए
दिल घाइल है उस की बिंदी काजल से
ये दिल उस की याद से यूँ वाबस्ता है
वाबस्ता झनकार हो जैसे पायल से
साक़ी आज इस पैमाने को दूर ही रख
आज तो अपनी शर्त लगी है बोतल से
बज़्म है यूँ रौशन उस से गोया उस ने
चाँद सितारें बाँध रखे हों आँचल से
वो इक चाँद सा चेहरा जब से देखा है
नीरज मुझ को होश नहीं है उस पल से
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मोहब्बत का नहीं इक दिन मुकर्रर
मोहब्बत उम्रभर का सिलसिला है
मोहब्बत उम्रभर का सिलसिला है
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तेरी चाहत ही मार डालेगी
दिल की हसरत ही मार डालेगी
दिल की हसरत ही मार डालेगी
ऐसा लगता है एक दिन मुझ को
ये मोहब्बत ही मार डालेगी
तुम से अब फ़ासला ही बेहतर है
वर्ना ये लत ही मार डालेगी
कुछ तो मर जाएँगे मुसीबत में
कुछ को दहशत ही मार डालेगी
मत बताओ के कैसे जीना है
ये नसीहत ही मार डालेगी
फिर किसी क़ैस को मुहब्बत में
उस की वहशत ही मार डालेगी
दोनों रुसवा हुए मुहब्बत में
उन को तोहमत ही मार डालेगी
जो परिंदे क़फ़स में हैं, उन को
ये हिफ़ाज़त ही मार डालेगी
प्यार इंसान की ज़रूरत है
ये ज़रूरत ही मार डालेगी
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दुनिया जिस को पागल कहती है यारो
कोई प्यार का मारा भी हो सकता है
क्यूँ हर बात पे तेरा मेरा कहते हो
ये संसार हमारा भी हो सकता है
एक ग़ज़ल में नाम बताऊँगा उस का
और वो नाम तुम्हारा भी हो सकता है
तुम से मिल कर ही हम को एहसास हुआ
कोई इतना प्यारा भी हो सकता है
होंठों पर पहरे बिठलाकर क्या होगा
आँख का एक इशारा भी हो सकता है
कर के इरादा जाने का फिर मत रुकना
वर्ना प्यार दोबारा भी हो सकता है
कब सोचा था “नीरज” हम ने उस का ग़म
यूँ जीने का सहारा भी हो सकता है
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मुसाफ़िर हूँ, ठिकाना चाहता हूँ
दिलों में आशियाना चाहता हूँ
दिलों में आशियाना चाहता हूँ
मैं जुगनू ही सही, ऐ चाँद तारो!
अँधेरे को मिटाना चाहता हूँ
मिलेगा जो मुक़द्दर में है, पर मैं
मुक़द्दर आज़माना चाहता हूँ
ग़ज़ल लिक्खी है इक तेरे लिए, सो
तुझे मिल कर सुनाना चाहता हूँ
उदासी से बहुत उकता गया मन
मैं खुलकर मुस्कुराना चाहता हूँ
तुम्हारी याद तो जीने न देगी
मैं तुम को भूल जाना चाहता हूँ
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