निगाहें आप की क़ातिल हैं और प्यारी भी
शिकार हो गया ख़ुद देख कर शिकारी भी
नचा रही है इशारों पे अपने दुनिया को
खुला ये राज़ के है ज़िंदगी मदारी भी
यही है डर के वो सुन कर ख़फ़ा न हो जाए
उसी से प्यार है हम को, उसी से यारी भी
उसे ही भूल गए इंतिज़ार जिस का था
कभी-कभार तो ऐसी रही ख़ुमारी भी
ज़रा सी देर में करता है दिल क़यास कई
अजीब चीज़ है ऐ दोस्त बे-क़रारी भी
अभी ख़मोश है तू देख कर सितम मुझ पर
कर इंतिज़ार के आएगी तेरी बारी भी
वो एक क़िस्सा कहानी न बन सका “नीरज”
के मुख़्तसर ही रही दास्ताँ हमारी भी
— Neeraj Naveed















