ख़ार ही ख़ार हैं गुलाब नहीं
उसके तोहफ़े का भी जवाब नहीं
चाँद हो तुम मैं इक चराग़ सही
पर मैं सूरज से फ़ैज़याब नहीं
नींद टूटेगी जान जाओगे
मैं हक़ीक़त हूँ कोई ख़्वाब नहीं
सबको औक़ात के सिवा बख़्शा
रहमतों का तिरी हिसाब नहीं
जो भी माँगा मिला हमें लेकिन
इक वही है जो दस्तियाब नहीं
हुस्न सजकर बहुत निखरता है
सादगी का मगर जवाब नहीं
'इश्क़ की क़ैदस निकलने को
कोई तरक़ीब कामयाब नहीं
ऐसी तक़दीर भी न हो “नीरज”
शाम-ए-हिज्र है और शराब नहीं
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