हुक्मरानों पे शे'र कहते हो?
कैसे लोगों पे शे'र कहते हो
तीरगी बढ़ रही थी तब चुप थे
अब चराग़ों पे शे'र कहते हो?
क़ैद रखते हो उन को पिंजरे में
और परिंदों पे शे'र कहते हो?
तुम ज़मीं के तो हो नहीं पाए!
आसमानों पे शे'र कहते हो?
काट डाले दरख़्त सारे अब
साएबानों पे शे'र कहते हो?
चंद सिक्कों में बेचकर ईमान
अब उसूलों पे शे'र कहते हो?
— Neeraj Naveed















