पहले तो हम भी जीते थे बिंदास ज़िंदगी

अब तो दिल-ओ-दिमाग पे तारी है आशिक़ी

वो शख़्स मर चुका है फ़क़त जिस्म है वही
मैं वो नहीं के जिस ने तुम्हें चाहा था कभी

क़िस्सा तमाम हो गया ऐ दोस्त पर हमें
है याद आजतक वो मुलाक़ात आख़िरी

इक दूसरे से रहते हैं दोनों ख़फ़ा ख़फ़ा
तक़दीर और इश्क़ की बनती नहीं कभी!

मसरूफ़ियत का उस ने बहाना बना दिया
हम भी समझ गए के मुहब्बत नहीं रही!

सब ने किनारा कर लिया है देखते हैं अब
कब तक हमारा साथ निभाती है ज़िंदगी

ऐसा नहीं के प्यार में धोका मिला हमें
हम को किसी बहाने तो करनी थी शा'इरी

तेरा ही नाम ले के चिढ़ाते हैं मुझ को दोस्त
हो बात कोई कहते हैं हाँ हाँ वही वही

हालात हार जाते हैं हिम्मत के सामने
जब ज़िंदगी का साथ निभाती है ज़िंदगी

— Neeraj Naveed

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