क्या ज़रूरी है इसे प्यार ही समझा जाए
क्यूँँ न इनकार को इनकार ही समझा जाए
जब न मुमकिन हो मुलाक़ात तो यारो उसका
ख़्वाब भी देखना दीदार ही समझा जाए
क्या हक़ीक़त है ये चेहरे भी बयाँ करते हैं
सो हर इक चेहरे को अख़बार ही समझा जाए
मैं किसी तौर भी पीछे नहीं हटने वाला
मेरी इस बात को ललकार ही समझा जाए
हम जो मंज़िल की तरफ़ बढ़ न सके तब जाना
डर को भी राह की दीवार ही समझा जाए
शाइरी के कई किरदार हक़ीक़त में नहीं
यानी किरदार को किरदार ही समझा जाए
ऐ ख़ुदा! तेरे जहाँ में है अगर 'इश्क़ गुनाह
फिर तो मुझको भी गुनहगार ही समझा जाए
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