टूटा है मेरा ख़्वाब ला मुझ को शराब दे
वहशत है बे-हिसाब ला मुझ को शराब दे
पीते हैं क्यूँ शराब यहाँ लोग क्या पता
ढूँढूँगा मैं जवाब ला मुझ को शराब दे
बे-शक ग़म-ओ-ख़ुशी में निभाती हो साथ पर
मय चीज़ है ख़राब ला मुझ को शराब दे
क्या क्या गँवा दिया है मियाँ इस शराब में
रक्खा नहीं हिसाब ला मुझ को शराब दे
रहता हूँ गर मैं होश में तो भूलता नहीं
चेहरा वो माहताब ला मुझ को शराब दे
मुझ से तो एक इश्क़ भी पूरा न हो सका
जीना हुआ अज़ाब ला मुझ को शराब दे
मेरी किताब-ए-ज़ीस्त में ख़ुशियाँ थीं जिस जगह
ख़ाली रहा वो बाब ला मुझ को शराब दे
— Neeraj Naveed















