मेआ'र और लफ़्ज़-ओ-मआ'नी पे ध्यान दे
ऊला के साथ मिस्रा-ए-सानी पे ध्यान दे
आया है देर से वो मगर अब है रू-ब-रू
तकरार छोड़ नग़्ज़-बयानी पे ध्यान दे
जिस ने लिखी है उस पे ही अंजाम छोड़ दे
किरदार है, बस अपनी कहानी पे ध्यान दे
कश्ती उसी की जा के लगेगी किनारे जो
दरिया के साथ उस की रवानी पे ध्यान दे
अच्छा जो लाए वक़्त मिरा वो घड़ी दिखा
वरना ये साफ़ कह के पुरानी पे ध्यान दे
एक ऐसा दोस्त चाहिए “नीरज” हमें के जो
पीछे हँसी के आँख के पानी पे ध्यान दे
— Neeraj Naveed















