मुसाफ़िर हूँ, ठिकाना चाहता हूँ
दिलों में आशियाना चाहता हूँ
मैं जुगनू ही सही, ऐ चाँद तारो!
अँधेरे को मिटाना चाहता हूँ
मिलेगा जो मुक़द्दर में है, पर मैं
मुक़द्दर आज़माना चाहता हूँ
ग़ज़ल लिक्खी है इक तेरे लिए, सो
तुझे मिलकर सुनाना चाहता हूँ
उदासी से बहुत उकता गया मन
मैं खुलकर मुस्कुराना चाहता हूँ
तुम्हारी याद तो जीने न देगी
मैं तुमको भूल जाना चाहता हूँ
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