Chakbast Brij Narayan

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Chakbast Brij Narayan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Chakbast Brij Narayan's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता — Chakbast Brij Narayan
अदब ता'लीम का जौहर है ज़ेवर है जवानी का वही शागिर्द हैं जो ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं — Chakbast Brij Narayan

Ghazal

दिल किए तस्ख़ीर बख़्शा फ़ैज़-ए-रूहानी मुझे हुब्ब-ए-क़ौमी हो गया नक़्श-ए-सुलैमानी मुझे मंज़िल-ए-इबरत है दुनिया अहल-ए-दुनिया शाद हैं ऐसी दिल-जमई से होती है परेशानी मुझे जाँचता हूँ वुसअत-ए-दिल हमला-ए-ग़म के लिए इम्तिहाँ है रंज-ओ-हिरमाँ की फ़रावानी मुझे हक़-परस्ती की जो मैं ने बुत-परस्ती छोड़ कर बरहमन कहने लगे इल्हाद का बानी मुझे कुल्फ़त-ए-दुनिया मिटे भी तो सख़ी के फ़ैज़ से हाथ धोने को मिले बहता हुआ पानी मुझे ख़ुद-परस्ती मिट गई क़द्र-ए-मोहब्बत बढ़ गई मातम-ए-अहबाब है तालीम-ए-रूहानी मुझे क़ौम का ग़म मोल ले कर दिल का ये आलम हुआ याद भी आती नहीं अपनी परेशानी मुझे ज़र्रा ज़र्रा है मिरे कश्मीर का मेहमाँ-नवाज़ राह में पत्थर के टुकड़ों ने दिया पानी मुझे लखनऊ में फिर हुई आरास्ता बज़्म-ए-सुख़न बा'द मुद्दत फिर हुआ ज़ौक़-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी मुझे — Chakbast Brij Narayan
फ़ना का होश आना ज़िंदगी का दर्द-ए-सर जाना अजल क्या है ख़ुमार-ए-बादा-ए-हस्ती उतर जाना अज़ीज़ान-ए-वतन को ग़ुंचा ओ बर्ग ओ समर जाना ख़ुदा को बाग़बाँ और क़ौम को हम ने शजर जाना उरूस-ए-जाँ नया पैराहन-ए-हस्ती बदलती है फ़क़त तम्हीद आने की है दुनिया से गुज़र जाना मुसीबत में बशर के जौहर-ए-मर्दाना खुलते हैं मुबारक बुज़दिलों को गर्दिश-ए-क़िस्मत से डर जाना वो तब्-ए-यास-परवर ने मुझे चश्म-ए-अक़ीदत दी कि शाम-ए-ग़म की तारीकी को भी नूर-ए-सहर जाना बहुत सौदा रहा वाइज़ तुझे नार-ए-जहन्नम का मज़ा सोज़-ए-मोहब्बत का भी कुछ ऐ बे-ख़बर जाना करिश्मा ये भी है ऐ बे-ख़बर इफ़्लास-ए-क़ौमी का तलाश-ए-रिज़्क़ में अहल-ए-हुनर का दर-ब-दर जाना अजल की नींद में भी ख़्वाब-ए-हस्ती गर नज़र आया तो फिर बेकार है तंग आ के इस दुनिया से मर जाना वो सौदा ज़िंदगी का है कि ग़म इंसान सहता है नहीं तो है बहुत आसान इस जीने से मर जाना चमन-ज़ार-ए-मोहब्ब्बत में उसी ने बाग़बानी की कि जिस ने अपनी मेहनत को ही मेहनत का समर जाना सिधारी मंज़िल-ए-हस्ती से कुछ बे-ए'तिनाई से तन-ए-ख़ाकी को शायद रूह ने गर्द-ए-सफ़र जाना — Chakbast Brij Narayan
अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा में परा होता जिधर उठती नज़र कोसों तलक जंगल हरा होता मय-ए-गुल-रंग लुटती यूँँ दर-ए-मय-ख़ाना वा होता न पीने की कमी होती न साक़ी से गिला होता हज़ारों जान देते हैं बुतों की बे-वफ़ाई पर अगर उन में से कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता रुलाया अहल-ए-महफ़िल को निगाह-ए-यास ने मेरी क़यामत थी जो इक क़तरा इन आँखों से जुदा होता ख़ुदा को भूल कर इंसान के दिल का ये आलम है ये आईना अगर सूरत-नुमा होता तो क्या होता अगर दम भर भी मिट जाती ख़लिश ख़ार-ए-तमन्ना की दिल-ए-हसरत-तलब को अपनी हस्ती से गिला होता — Chakbast Brij Narayan
दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-ईमाँ होना आदमियत है यही और यही इंसाँ होना नौ-गिरफ़्तार-ए-बला तर्ज़-ए-वफ़ा क्या जानें कोई ना-शाद सिखा दे उन्हें नालाँ होना रोके दुनिया में है यूँँ तर्क-ए-हवस की कोशिश जिस तरह अपने ही साए से गुरेज़ाँ होना ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना दफ़्तर-ए-हुस्न पे मोहर-ए-यद-ए-क़ुदरत समझो फूल का ख़ाक के तोदे से नुमायाँ होना दिल असीरी में भी आज़ाद है आज़ादों का वलवलों के लिए मुमकिन नहीं ज़िंदाँ होना गुल को पामाल न कर लाल-ओ-गुहर के मालिक है उसे तुर्रा-ए-दस्तार-ए-ग़रीबाँ होना है मेरा ज़ब्त-ए-जुनूँ जोश-ए-जुनूँ से बढ़ कर नंग है मेरे लिए चाक-गरेबाँ होना क़ैद यूसुफ़ को ज़ुलेख़ा ने किया कुछ न किया दिल-ए-यूसुफ़ के लिए शर्त था ज़िंदाँ होना — Chakbast Brij Narayan
मिरी बे-ख़ुदी है वो बे-ख़ुदी कि ख़ुदी का वहम-ओ-गुमाँ नहीं ये सुरूर-ए-साग़र-ए-मय नहीं ये ख़ुमार-ए-ख़्वाब-ए-गिराँ नहीं जो ज़ुहूर-ए-आलम-ए-ज़ात है ये फ़क़त हुजूम-ए-सिफ़ात है है जहाँ का और वजूद क्या जो तिलिस्म-ए-वहम-ओ-गुमाँ नहीं ये हयात आलम-ए-ख़्वाब है न गुनाह है न सवाब है वही कुफ़्र-ओ-दीं में ख़राब है जिसे इल्म-ए-राज़-ए-जहाँ नहीं न वो ख़ुम में बादे का जोश है न वो हुस्न जल्वा-फ़रोश है न किसी को रात का होश है वो सहर कि शब का गुमाँ नहीं वो ज़मीं पे जिन का था दबदबा कि बुलंद अर्श पे नाम था उन्हें यूँँ फ़लक ने मिटा दिया कि मज़ार तक का निशाँ नहीं — Chakbast Brij Narayan
न कोई दोस्त दुश्मन हो शरीक-ए-दर्द-ओ-ग़म मेरा सलामत मेरी गर्दन पर रहे बार-ए-अलम मेरा लिखा ये दावर-ए-महशर ने मेरी फ़र्द-ए-इसयाँ पर ये वो बंदा है जिस पर नाज़ करता है करम मेरा कहा ग़ुंचा ने हँस कर वाह क्या नैरंग-ए-आलम है वजूद गुल जिसे समझे हैं सब है वो अदम मेरा कशाकश है उम्मीद-ओ-यास की ये ज़िंदगी क्या है इलाही ऐसी हस्ती से तो अच्छा था अदम मेरा दिल-ए-अहबाब में घर है शगुफ़्ता रहती है ख़ातिर यही जन्नत है मेरी और यही बाग़-ए-इरम मेरा मुझे अहबाब की पुर्सिश की ग़ैरत मार डालेगी क़यामत है अगर इफ़शा हुआ राज़-ए-अलम मेरा खड़ी थीं रास्ता रोके हुए लाखों तमन्नाएँ शहीद-ए-यास हूँ निकला है किस मुश्किल से दम मेरा ख़ुदा ने इल्म बख़्शा है अदब अहबाब करते हैं यही दौलत है मेरी और यही जाह-ओ-हशम मेरा ज़बान-ए-हाल से ये लखनऊ की ख़ाक कहती है मिटाया गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने जाह-ओ-हशम मेरा किया है फ़ाश पर्दा कुफ़्र-ओ-दीं का इस क़दर मैं ने कि दुश्मन है बरहमन और अदू शैख़-ए-हरम मेरा — Chakbast Brij Narayan
कुछ ऐसा पास-ए-ग़ैरत उठ गया इस अहद-ए-पुर-फ़न में कि ज़ेवर हो गया तौक़-ए-ग़ुलामी अपनी गर्दन में शजर सकते में हैं ख़ामोश हैं बुलबुल नशेमन में सिधारा क़ाफ़िला फूलों का सन्नाटा है गुलशन में गराँ थी धूप और शबनम भी जिन पौदों को गुलशन में तिरी क़ुदरत से वो फूले-फले सहरा के दामन में हवा-ए-ताज़ा दिल को ख़ुद-ब-ख़ुद बेचैन करती है क़फ़स में कह गया कोई बहार आई है गुलशन में मिटाना था उसे भी जज़्बा-ए-शौक़-ए-फ़ना तुझ को निशान-ए-क़ब्र-ए-मजनूँ दाग़ है सहरा के दामन में ज़माना में नहीं अहल-ए-हुनर का क़दर-दाँ बाक़ी नहीं तो सैकड़ों मोती हैं इस दरिया के दामन में यहाँ तस्बीह का हल्क़ा वहाँ ज़ुन्नार का फंदा असीरी लाज़मी है मज़हब-ए-शैख़-ओ-बरहमन में जिन्हें सींचा था ख़ून-ए-दिल से अगले बाग़बानों ने तरसते अब हैं पानी को वो पौदे मेरे गुलशन में दिखाया मो'जिज़ा हुस्न-ए-बशर का दस्त-ए-क़ुदरत ने भरी तासीर तस्वीर-ए-गिली के रंग-ओ-रोग़न में शहीद-ए-यास हूँ रुस्वा हूँ नाकामी के हाथों से जिगर का चाक बढ़ कर आ गया है मेरे दामन में जहाँ में रह के यूँँ क़ाएम हूँ अपनी बे-सबाती पर कि जैसे अक्स-ए-गुल रहता है आब-ए-जू-ए-गुलशन में शराब-ए-हुस्न को कुछ और ही तासीर देता है जवानी के नुमू से बे-ख़बर होना लड़कपन में शबाब आया है पैदा रंग है रुख़्सार-ए-नाज़ुक से फ़रोग़-ए-हुस्न कहता है सहर होती है गुलशन में नहीं होता है मुहताज-ए-नुमाइश फ़ैज़ शबनम का अँधेरी रात में मोती लुटा जाती है गुलशन में मता-ए-दर्द-ए-दिल इक दौलत-ए-बेदार है मुझ को दुर-ए-शहवार हैं अश्क-ए-मोहब्बत मेरे दामन में न बतलाई किसी ने भी हक़ीक़त राज़-ए-हस्ती की बुतों से जा के सर फोड़ा बहुत दैर-ए-बरहमन में पुरानी काविशें दैर-ओ-हरम की मिटती जाती है नई तहज़ीब के झगड़े हैं अब शैख़-ओ-बरहमन में उड़ा कर ले गई बाद-ए-ख़िज़ाँ इस साल उस को भी रहा था एक बर्ग-ए-ज़र्द बाक़ी मेरे गुलशन में वतन की ख़ाक से मर कर भी हम को उन्स बाक़ी है मज़ा दामान-ए-मादर का है इस मिट्टी के दामन में — Chakbast Brij Narayan
नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं वतन की आबरू अहल-ए-वतन बर्बाद करते हैं हवा में उड़ के सैर-ए-आलम-ए-ईजाद करते हैं फ़रिश्ते दंग हैं वो काम आदम-ज़ाद करते हैं नया मस्लक नया रंग-ए-सुख़न ईजाद करते हैं उरूस-ए-शेर को हम क़ैद से आज़ाद करते हैं मता-ए-पास-ए-ग़ैरत‍‍‍ बुल-हवस बर्बाद करते हैं लब-ए-ख़ामोश को शर्मिंदा-ए-फ़र्याद करते हैं हवा-ए-ताज़ा पा कर बोस्ताँ को याद करते हैं असीरान-ए-क़फ़स वक़्त-ए-सहर फ़रियाद करते हैं ज़रा ऐ कुंज-ए-मरक़द याद रखना उस हमिय्यत को कि घर वीरान कर के हम तुझे आबाद करते हैं हर इक ख़िश्त-ए-कुहन अफ़्साना-ए-देरीना कहती है ज़बान-ए-हाल से टूटे खंडर फ़रियाद करते हैं बला-ए-जाँ हैं ये तस्बीह और ज़ुन्नार के फंदे दिल-ए-हक़-बीं को हम इस क़ैद से आज़ाद करते हैं अज़ाँ देते हैं बुत-ख़ाने में जा कर शान-ए-मोमिन से हरम के नारा-ए-नाक़ूस हम ईजाद करते हैं निकल कर अपने क़ालिब से नया क़ालिब बसाएगी असीरी के लिए हम रूह को आज़ाद करते हैं मोहब्बत के चमन में मज्मा'-ए-अहबाब रहता है नई जन्नत इसी दुनिया में हम आबाद करते हैं नहीं घटती मिरी आँखों में तारीकी शब-ए-ग़म की ये तारे रौशनी अपनी अबस बर्बाद करते हैं थके-माँदे मुसाफ़िर ज़ुल्मत-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ में बहार-ए-जल्वा-ए-सुब्ह-ए-वतन को याद करते हैं दिल-ए-नाशाद रोता है ज़बाँ उफ़ कर नहीं सकती कोई सुनता नहीं यूँँ बे-नवा फ़रियाद करते हैं जनाब-ए-शैख़ को ये मश्क़ है याद-ए-इलाही की ख़बर होती नहीं दिल को ज़बाँ से याद करते हैं नज़र आती है दुनिया इक इबादत-गाह-ए-नूरानी सहर का वक़्त है बंदे ख़ुदा को याद करते हैं सबक़ उम्र-ए-रवाँ का दिल-नशीं होने नहीं पाता हमेशा भूलते जाते हैं जो कुछ याद करते हैं ज़माने का मोअल्लिम इम्तिहाँ उन का नहीं करता जो आँखें खोल कर ये दर्स-ए-हस्ती याद करते हैं अदब ता'लीम का जौहर है ज़ेवर है जवानी का वही शागिर्द हैं जो ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं न जानी क़द्र तेरी उम्र-ए-रफ़्ता हम ने कॉलेज में निकल आते हैं आँसू अब तुझे जब याद करते हैं — Chakbast Brij Narayan
उन्हें ये फ़िक्र है हर दम नई तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है हमें ये शौक़ है देखें सितम की इंतिहा क्या है गुनह-गारों में शामिल हैं गुनाहों से नहीं वाक़िफ़ सज़ा को जानते हैं हम ख़ुदा जाने ख़ता क्या है ये रंग-ए-बे-कसी रंग-ए-जुनूँ बन जाएगा ग़ाफ़िल समझ ले यास-ओ-हिरमाँ के मरज़ की इंतिहा क्या है नया बिस्मिल हूँ मैं वाक़िफ़ नहीं रस्म-ए-शहादत से बता दे तू ही ऐ ज़ालिम तड़पने की अदा क्या है चमकता है शहीदों का लहू पर्दे में क़ुदरत के शफ़क़ का हुस्न क्या है शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना क्या है उमीदें मिल गईं मिट्टी में दौर-ए-ज़ब्त-ए-आख़िर है सदा-ए-ग़ैब बतला दे हमें हुक्म-ए-ख़ुदा क्या है — Chakbast Brij Narayan

Nazm

फ़ैज़-ए-क़ुदरत से जो तक़दीर खुली आलम की साहिल-ए-हिन्द पे वहदत की तजल्ली चमकी मिट गई जहल की शब सुब्ह का तारा चमका आर्य-वर्त की क़िस्मत का सितारा चमका अहल-ए-दिल पर हुई कैफ़िय्यत-ए-इरफ़ाँ तारी जिन से दुनिया में हुईं दीन की नहरें जारी थीं खुली जल्वा-गह-ए-ख़ास में राहें उन की वाक़िफ़-ए-राज़-ए-हक़ीक़त थीं निगाहें उन की अर्श से उन के लिए नूर-ए-ख़ुदा आया था बंदा-ए-खास थे ऋषियों का लक़ब पाया था वेद उन के दिल-ए-हक़-केश की तस्वीरें हैं जल्वा-ए-क़ुदरत-ए-माबूद की तफ़्सीरें हैं ऐन कसरत में ये वहदत का सबक़ वेद में है एक ही नूर है जो ज़र्रा ओ ख़ुरशेद में है जिस से इंसान में है जोश-ए-जवानी पैदा इसी जौहरस है मौजों में रवानी पैदा रंग गुलशन में फ़ज़ा दामन-ए-कोहसार में है ख़ूँ रग-ए-गुल में है नश्तर की ख़लिश ख़ार में है तमकनत हुस्न में है जोश है दीवाने में रौशनी शम्अ' में है नूर है परवाने में रंग-ओ-बू हो के समाया वही गुलज़ारों में अब्र बन कर वही बरसा किया कोहसारों में शौक़ हो कर दिल-ए-मज्ज़ूब पे छाया है वही दर्द बन कर दिल-ए-शाइ'र में समाया है वही नूर-ए-ईमाँ से जो पैदा हो सफ़ा सीने में अक्स उस का नज़र आता है इस आईने में — Chakbast Brij Narayan
लरज़ रहा था वतन जिस ख़याल के डर से वो आज ख़ून रुलाता है दीदा-ए-तर से सदा ये आती है फल फूल और पत्थर से ज़मीं पे ताज गिरा क़ौम-ए-हिन्द के सर से हबीब क़ौम का दुनिया से यूँँ रवाना हुआ ज़मीं उलट गई क्या मुंक़लिब ज़माना हुआ बढ़ी हुई थी नहूसत ज़वाल-ए-पैहम की तिरे ज़ुहूर से तक़दीर क़ौम की चमकी निगाह-ए-यास थी हिंदुस्ताँ पे आलम की अजीब शय थी मगर रौशनी तिरे दम की तुझी को मुल्क में रौशन दिमाग़ समझे थे तुझे ग़रीब के घर का चराग़ समझे थे वतन को तू ने सँवारा किस आब-ओ-ताब के साथ सहर का नूर बढ़े जैसे आफ़्ताब के साथ चुने रिफ़ाह के गुल हुस्न-ए-इंतिख़ाब के साथ शबाब क़ौम का चमका तिरे शबाब के साथ जो आज नश्व-ओ-नुमा का नया ज़माना है ये इंक़लाब तिरी उम्र का फ़साना है रहा मिज़ाज में सौदा-ए-क़ौम ख़ू हो कर वतन का इश्क़ रहा दिल की आरज़ू हो कर बदन में जान रही वक़्फ़-ए-आबरू हो कर रगों में जोश-ए-मोहब्बत रहे लहू हो हो कर ख़ुदा के हुक्म से जब आब-ओ-गिल बना तेरा किसी शहीद की मिट्टी से दिल बना तेरा वतन की जान पे क्या क्या तबाहियाँ आईं उमँड उमँड के जिहालत की बदलियाँ आईं चराग़-ए-अम्न बुझाने को आँधियाँ आईं दिलों में आग लगाने को बिजलियाँ आईं इस इंतिशार में जिस नूर का सहारा था उफ़ुक़ पे क़ौम के वो एक ही सितारा था हदीस-ए-क़ौम बनी थी तिरी ज़बाँ के लिए ज़बाँ मिली थी मोहब्बत की दास्ताँ के लिए ख़ुदा ने तुझ को पयम्बर किया यहाँ के लिए कि तेरे हाथ में नाक़ूस था अज़ाँ के लिए वतन की ख़ाक तिरी बारगाह-ए-आला' है हमें यही नई मस्जिद नया शिवाला है ग़रीब हिन्द ने तन्हा नहीं ये दाग़ सहा वतन से दूर भी तूफ़ान रंज-ओ-ग़म का उठा हबीब क्या हैं हरीफ़ों ने ये ज़बाँ से कहा सफ़ीर-ए-क़ौम जिगर-बंद-ए-सल्तनत न रहा पयाम शह ने दिया रस्म-ए-ताज़ियत के लिए कि तू सुतून था ऐवान-ए-सल्तनत के लिए दिलों में नक़्श हैं अब तक तिरी ज़बाँ के सुख़न हमारी राह में गोया चराग़ हैं रौशन फ़क़ीर थे जो तिरे दर के ख़ादिमान-ए-वतन उन्हें नसीब कहाँ होगा अब तिरा दामन तिरे अलम में वो इस तरह जान खोते हैं कि जैसे बाप से छुट कर यतीम रोते हैं अजल के दाम में आना है यूँँ तो आलम को मगर ये दिल नहीं तय्यार तेरे मातम को पहाड़ कहते हैं दुनिया में ऐसे ही ग़म को मिटा के तुझ को अजल ने मिटा दिया हम को जनाज़ा हिन्द का दर से तिरे निकलता है सुहाग क़ौम का तेरी चिता में जलता है रहेगा रंज ज़माने में यादगार तिरा वो कौन दिल है कि जिस में नहीं मज़ार तिरा जो कल रक़ीब था है आज सोगवार तिरा ख़ुदा के सामने है मुल्क शर्मसार तिरा पली है क़ौम तिरे साया-ए-करम के तले हमें नसीब थी जन्नत तिरे क़दम के तले — Chakbast Brij Narayan
मौत ने रात के पर्दे में किया कैसा वार रौशनी-ए-सुब्ह वतन की है कि मातम का ग़ुबार मा'रका सर्द है सोया है वतन का सरदार तनतना शे'र का बाक़ी नहीं सूना है कछार बेकसी छाती है तक़दीर फिरी जाती है क़ौम के हाथ से तलवार गिरी जाती है उठ गया दौलत-ए-नामूस-ए-वतन का वारिस क़ौम मरहूम के एज़ाज़-ए-कुहन का वारिस जाँ-निसार-ए-अज़ली शेर-ए-दकन का वारिस पेशवाओं के गरजते हुए रन का वारिस थी समाई हुई पूना की बहार आँखों में आख़िरी दौर का बाक़ी था ख़ुमार आँखों में मौत महाराष्ट्र की थी या तिरी मरने की ख़बर मुर्दनी छा गई इंसान तो क्या पत्थर पर पत्तियाँ झुक गईं मुरझा गए सहरा के शजर रह गए जोश में बहते हुए दरिया थम कर सर्द-ओ-शादाब हवा रुक गई कोहसारों की रौशनी घट गई दो-चार घड़ी तारों की था निगहबान-ए-वतन दबदबा-ए-आम तिरा न डिगें पाँव पे था क़ौम को पैग़ाम दिल रक़ीबों के लरज़ते थे ये था काम तेरा नींद से चौंक पड़े सुन जो लिया नाम तेरा याद कर के तुझे मज़लूम-ए-वतन रोएँगे बंदा-ए-रस्म-ए-जफ़ा चैन से अब सोएँगे ज़िंदगी तेरी बहार चमनिस्तान-ए-वफ़ा आबरू तेरे लिए क़ौम से पैमान-ए-वफ़ा आशिक़-ए-नाम-ए-वतन कुश्ता-ए-अरमान-ए-वफ़ा मर्द-ए-मैदान-ए-वफ़ा जिस्म-ए-वफ़ा जान-ए-वफ़ा हो गई नज़्र-ए-वतन हस्ती-ए-फ़ानी तेरी न तो पीरी रही तेरी न जवानी तेरी औज-ए-हिम्मत पे रहा तेरी वफ़ा का ख़ुर्शेद मौत के ख़ौफ़ पे ग़ालिब रही ख़िदमत की उमेद बन गया क़ैद का फ़रमान भी राहत की नवेद हुए तारीकी-ए-ज़िंदाँ में तिरे बाल सपेद फिर रहा है मिरी नज़रों में सरापा तेरा आह-ओ-क़ैद-ए-सितम और बुढ़ापा तेरा मो'जिज़ा अश्क-ए-मोहब्बत का दिखाया तू ने एक क़तरा से ये तूफ़ान उठाया तू ने मुल्क को हस्ती-ए-बेदार बनाया तू ने जज़्बा-ए-क़ौम को जादू को जगाया तू ने इक तड़प आ गई सोते हुए अरमानों में बिजलियाँ कौंद गईं क़ौम के वीरानों में लाश को तेरी सँवारें न रफ़ीक़ान-ए-कुहन हो जबीं के लिए संदल की जगह ख़ाक-ए-वतन तर हुआ है जो शहीदों के लहू से दामन दें उसी का तुझे पंजाब के मज़लूम कफ़न शोर-ए-मातम न हो झंकार हो ज़ंजीरों की चाहिए क़ौम के भीषम को चिता तीरों की — Chakbast Brij Narayan
ज़मीन हिन्द की रुत्बा में अर्श-ए-आ'ला है ये होम-रूल की उम्मीद का उजाला है मिसिज़-बेसेंट ने इस आरज़ू को पाला है फ़क़ीर क़ौम के हैं और ये राग माला है तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले वतन-परस्त शहीदों की ख़ाक लाएँगे हम अपनी आँख का सुर्मा उसे बनाएँगे ग़रीब माँ के लिए दर्द-दुख उठाएँगे यही पयाम-ए-वफ़ा क़ौम को सुनाएँगे तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले हमारे वास्ते ज़ंजीर-ओ-तौक़ गहना है वफ़ा के शौक़ में गाँधी ने जिस को पहना है समझ लिया कि हमें रंज-ओ-दर्द सहना है मगर ज़बाँ से कहेंगे वही जो कहना है तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले पहनाने वाले अगर बेड़ियाँ पहनाएँगे ख़ुशी से क़ैद के गोशे को हम बसाएँगे जो संतरी दर-ए-ज़िंदाँ के भी सो जाएँगे ये राग गा के उन्हें नींद से जगाएँगे तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले ज़बाँ को बंद किया है ये ग़ाफ़िलों को है नाज़ ज़रा रगों में लहू का भी देख लें अंदाज़ रहेगा जान के हम-राह दिल का सोज़-ओ-गुदाज़ चिता से आएगी मरने के बा'द ये आवाज़ तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले यही दुआ है वतन के शिकस्ता हालों की यही उमंग जवानी के नौनिहालों की जो रहनुमा है मोहब्बत पे मिटने वालों की हमें क़सम है उसी के सपेद बालों की तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले यही पयाम है कोयल का बाग़ के अंदर इसी हवा में है गंगा का ज़ोर आठ-पहर हिलाल-ए-ईद ने दी है यही दिलों को ख़बर पुकारता है हिमाला से अब्र उठ उठ कर तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले बसे हुए हैं मोहब्बत से जिन की क़ौम के घर वतन का पास है उन को सुहाग से बढ़ कर जो शीर-ख़ार हैं हिन्दोस्ताँ के लख़्त-ए-जिगर ये माँ के दूध से लिक्खा है उन के सीने पर तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले — Chakbast Brij Narayan
ये हिन्दोस्ताँ है हमारा वतन मोहब्बत की आँखों का तारा वतन हमारा वतन दिल से प्यारा वतन वो इस के दरख़्तों के तय्यारियाँ वो फल फूल पौदे वो फुल-वारियाँ हमारा वतन दिल से प्यारा वतन हवा में दरख़्तों का वो झूमना वो पत्तों का फूलों का मुँह चूमना हमारा वतन दिल से प्यारा वतन वो सावन में काली घटा की बहार वो बरसात की हल्की हल्की फुवार हमारा वतन दिल से प्यारा वतन वो बाग़ों में कोयल वो जंगल के मोर वो गंगा की लहरें वो जमुना का ज़ोर हमारा वतन दिल से प्यारा वतन इसी से है इस ज़िंदगी की बहार वतन की मोहब्बत हो या माँ का प्यार हमारा वतन दिल से प्यारा वतन — Chakbast Brij Narayan
रुख़्सत हुआ वो बाप से ले कर ख़ुदा का नाम राह-ए-वफ़ा की मंज़िल-ए-अव्वल हुई तमाम मंज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतिज़ाम दामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलाम इज़हार-ए-बे-कसी से सितम होगा और भी देखा हमें उदास तो ग़म होगा और भी दिल को सँभालता हुआ आख़िर वो नौनिहाल ख़ामोश माँ के पास गया सूरत-ए-ख़याल देखा तो एक दर में है बैठी वो ख़स्ता-हाल सकता सा हो गया है ये है शिद्दत-ए-मलाल तन में लहू का नाम नहीं ज़र्द रंग है गोया बशर नहीं कोई तस्वीर-ए-संग है क्या जाने किस ख़याल में गुम थी वो बे-गुनाह नूर-ए-नज़र ये दीदा-ए-हसरत से की निगाह जुम्बिश हुई लबों को भरी एक सर्द आह ली गोशा-हा-ए-चश्म से अश्कों ने रुख़ की राह चेहरे का रंग हालत-ए-दिल खोलने लगा हर मू-ए-तन ज़बाँ की तरह बोलने लगा आख़िर असीर-ए-यास का क़ुफ़्ल-ए-दहन खुला अफ़्साना-ए-शदाइद-ए-रंज-ओ-मेहन खुला इक दफ़्तर-ए-मज़ालिम-ए-चर्ख़-ए-कुहन खुला वा था दहान-ए-ज़ख़्म कि बाब-ए-सुख़न खुला दर्द-ए-दिल-ए-ग़रीब जो सर्फ़-ए-बयाँ हुआ ख़ून-ए-जिगर का रंग सुख़न से अयाँ हुआ रो कर कहा ख़मोश खड़े क्यूँँ हो मेरी जाँ मैं जानती हूँ जिस लिए आए हो तुम यहाँ सब की ख़ुशी यही है तो सहरा को हो रवाँ लेकिन मैं अपने मुँह से न हरगिज़ कहूँगी हाँ किस तरह बन में आँखों के तारे को भेज दूँ जोगी बना के राज-दुलारे को भेज दूँ दुनिया का हो गया है ये कैसा लहू सपीद अंधा किए हुए है ज़र-ओ-माल की उमीद अंजाम क्या हो कोई नहीं जानता ये भेद सोचे बशर तो जिस्म हो लर्ज़ां मिसाल-ए-बीद लिक्खी है क्या हयात-ए-अबद इन के वास्ते फैला रहे हैं जाल ये किस दिन के वास्ते लेती किसी फ़क़ीर के घर में अगर जनम होते न मेरी जान को सामान ये बहम डसता न साँप बन के मुझे शौकत-ओ-हशम तुम मेरे लाल थे मुझे किस सल्तनत से कम मैं ख़ुश हूँ फूँक दे कोई इस तख़्त-ओ-ताज को तुम ही नहीं तो आग लगा दूँगी राज को किन किन रियाज़तों से गुज़ारे हैं माह-ओ-साल देखी तुम्हारी शक्ल जब ऐ मेरे नौनिहाल पूरा हुआ जो ब्याह का अरमान था कमाल आफ़त ये आई मुझ पे हुए जब सफ़ेद बाल छटती हूँ उन से जोग लिया जिन के वास्ते क्या सब किया था मैं ने इसी दिन के वास्ते ऐसे भी ना-मुराद बहुत आएँगे नज़र घर जिन के बे-चराग़ रहे आह उम्र भर रहता मिरा भी नख़्ल-ए-तमन्ना जो बे-समर ये जा-ए-सब्र थी कि दुआ में नहीं असर लेकिन यहाँ तो बन के मुक़द्दर बिगड़ गया फल फूल ला के बाग़-ए-तमन्ना उजड़ गया सरज़द हुए थे मुझ से ख़ुदा जाने क्या गुनाह मँझधार में जो यूँँ मिरी कश्ती हुई तबाह आती नज़र नहीं कोई अम्न-ओ-अमाँ की राह अब याँ से कूच हो तो अदम में मिले पनाह तक़्सीर मेरी ख़ालिक़-ए-आलम बहल करे आसान मुझ ग़रीब की मुश्किल अजल करे सुन कर ज़बाँ से माँ की ये फ़रियाद-ए-दर्द-ख़ेज़ उस ख़स्ता-जाँ के दिल पे चली ग़म की तेग़-ए-तेज़ आलम ये था क़रीब कि आँखें हों अश्क-रेज़ लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़ सोचा यही कि जान से बेकस गुज़र न जाए नाशाद हम को देख के माँ और मर न जाए फिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूर मायूस क्यूँँ हैं आप अलम का है क्यूँँ वफ़ूर सदमा ये शाक़ आलम-ए-पीरी में है ज़रूर लेकिन न दिल से कीजिए सब्र-ओ-क़रार दूर शायद ख़िज़ाँ से शक्ल अयाँ हो बहार की कुछ मस्लहत इसी में हो परवरदिगार की ये ज'अल ये फ़रेब ये साज़िश ये शोर-ओ-शर होना जो है सब उस के बहाने हैं सर-ब-सर अस्बाब-ए-ज़ाहिरी में न इन पर करो नज़र क्या जाने क्या है पर्दा-ए-क़ुदरत में जल्वा-गर ख़ास उस की मस्लहत कोई पहचानता नहीं मंज़ूर क्या उसे है कोई जानता नहीं राहत हो या कि रंज ख़ुशी हो कि इंतिशार वाजिब हर एक रंग में है शुक्र-ए-किर्दगार तुम ही नहीं हो कुश्ता-ए-नैरंग-ए-रोज़गार मातम-कदे में दहर के लाखों हैं सोगवार सख़्ती सही नहीं कि उठाई कड़ी नहीं दुनिया में क्या किसी पे मुसीबत पड़ी नहीं देखे हैं इस से बढ़ के ज़माने ने इंक़लाब जिन से कि ब-गुनाहों की 'उम्रें हुईं ख़राब सोज़-ए-दरूँ से क़ल्ब ओ जिगर हो गए कबाब पीरी मिटी किसी की किसी का मिटा शबाब कुछ बन नहीं पड़ा जो नसीबे बिगड़ गए वो बिजलियाँ गिरीं कि भरे घर उजड़ गए माँ बाप मुँह ही देखते थे जिन का हर घड़ी क़ाएम थीं जिन के दम से उमीदें बड़ी बड़ी दामन पे जिन के गर्द भी उड़ कर नहीं पड़ी मारी न जिन को ख़्वाब में भी फूल की छड़ी महरूम जब वो गुल हुए रंग-ए-हयात से उन को जला के ख़ाक किया अपने हात से कहते थे लोग देख के माँ बाप का मलाल इन बे-कसों की जान का बचना है अब मुहाल है किब्रिया की शान गुज़रते ही माह-ओ-साल ख़ुद दिल से दर्द-ए-हिज्र का मिटता गया ख़याल हाँ कुछ दिनों तो नौहा-ओ-मातम हुआ किया आख़िर को रो के बैठ रहे और क्या किया पड़ता है जिस ग़रीब पे रंज-ओ-मेहन का बार करता है उस को सब्र अता आप किर्दगार मायूस हो के होते हैं इंसाँ गुनाहगार ये जानते नहीं वो है दाना-ए-रोज़गार इंसान उस की राह में साबित-क़दम रहे गर्दन वही है अम्र-ए-रज़ा में जो ख़म रहे और आप को तो कुछ भी नहीं रंज का मक़ाम बाद-ए-सफ़र वतन में हम आएँगे शाद-काम होते हैं बात करने में चौदह बरस तमाम क़ाएम उमीद ही से है दुनिया है जिस का नाम और यूँँ कहीं भी रंज-ओ-बला से मफ़र नहीं क्या होगा दो घड़ी में किसी को ख़बर नहीं अक्सर रियाज़ करते हैं फूलों पे बाग़बाँ है दिन की धूप रात की शबनम उन्हें गिराँ लेकिन जो रंग बाग़ बदलता है ना-गहाँ वो गुल हज़ार पर्दों में जाते हैं राएगाँ रखते हैं जो अज़ीज़ उन्हें अपनी जाँ की तरह मिलते हैं दस्त-ए-यास वो बर्ग-ए-ख़िज़ाँ की तरह लेकिन जो फूल खिलते हैं सहरा में बे-शुमार मौक़ूफ़ कुछ रियाज़ पे उन की नहीं बहार देखो ये क़ुदरत-ए-चमन-आरा-ए-रोज़गार वो अब्र-ओ-बाद ओ बर्फ़ में रहते हैं बरक़रार होता है उन पे फ़ज़्ल जो रब्ब-ए-करीम का मौज-ए-सुमूम बनती है झोंका नसीम का अपनी निगाह है करम-ए-कारसाज़ पर सहरा चमन बनेगा वो है मेहरबाँ अगर जंगल हो या पहाड़ सफ़र हो कि हो हज़र रहता नहीं वो हाल से बंदे के बे-ख़बर उस का करम शरीक अगर है तो ग़म नहीं दामान-ए-दश्त दामन-ए-मादर से कम नहीं — Chakbast Brij Narayan
आसफ़ुद्दौला-ए-मरहूम की तामीर-ए-कुहन जिस की सनअ'त का नहीं सफ़्हा-ए-हस्ती पे जवाब देख सय्याह उसे रात के सन्नाटे में मुँह से अपने मह-ए-कामिल ने जब उल्टी हो नक़ाब दर-ओ-दीवार नज़र आते हैं क्या साफ़-ओ-सुबुक सहर करती है निगाहों पे ज़िया-ए-महताब यही होता है गुमाँ ख़ाक से मस इस को नहीं है सँभाले हुए दामन में हवा-ए-शादाब यक-ब-यक दीदा-ए-हैराँ को ये शक होता है ढल के साँचे में ज़मीं पर उतर आया है सहाब बे-ख़ुदी कहती है आया ये फ़ज़ा में क्यूँँ कर किसी उस्ताद मुसव्विर का है ये जल्वा-ए-ख़्वाब इक अजब मंज़र-ए-दिल-गीर नज़र आता है दूर से आलम-ए-तस्वीर नज़र आता है — Chakbast Brij Narayan
हुब्ब-ए-क़ौमी का ज़बाँ पर इन दिनों अफ़्साना है बादा-ए-उल्फ़त से पुर दिल का मिरे पैमाना है जिस जगह देखो मोहब्बत का वहाँ अफ़्साना है इश्क़ में अपने वतन के हर बशर दीवाना है जब कि ये आग़ाज़ है अंजाम का क्या पूछना बादा-ए-उल्फ़त का ये तो पहला ही पैमाना है है जो रौशन बज़्म में क़ौमी तरक़्क़ी का चराग़ दिल फ़िदा हर इक का उस पर सूरत-ए-परवाना है मुझ से इस हमदर्दी-ओ-उल्फ़त का क्या होवे बयाँ जो है वो क़ौमी तरक़्क़ी के लिए दीवाना है लुत्फ़ यकताई में जो है वो दुई में है कहाँ बर-ख़िलाफ़ इस के जो हो समझो कि वो दीवाना है नख़्ल-ए-उल्फ़त जिन की कोशिश से उगा है क़ौम में क़ाबिल-ए-तारीफ़ उन की हिम्मत-ए-मर्दाना है है गुल-ए-मक़्सूद से पुर गुलशन-ए-कश्मीर आज दुश्मनी ना-इत्तिफ़ाक़ी सब्ज़ा-ए-बेगाना है दुर-फ़िशाँ है हर ज़बाँ हुब्ब-ए-वतन के वस्फ़ में जोश-ज़न हर सम्त बहर-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना है ये मोहब्बत की फ़ज़ा क़ाएम हुई है आप से आप का लाज़िम तह-ए-दिल से हमें शुक्राना है हर बशर को है भरोसा आप की इमदाद पर आप की हमदर्दियों का दूर दूर अफ़्साना है जम्अ'' हैं क़ौमी तरक़्क़ी के लिए अर्बाब-ए-क़ौम रश्क-ए-फ़िरदौस उन के क़दमों से ये शादी-ख़ाना है — Chakbast Brij Narayan
दर्द है दिल के लिए और दिल इंसाँ के लिए ताज़गी बर्ग-ओ-समर की चमनिस्ताँ के लिए साज़-ए-आहंग-ए-जुनूँ तार-ए-रग-ए-जाँ के लिए बे-ख़ुदी शौक़ की बे-सर-ओ-सामाँ के लिए क्या कहूँ कौन हवा सर में भरी रहती है बे पिए आठ-पहर बे-ख़बरी रहती है न हूँ शाइ'र न वली हूँ न हूँ एजाज़-ए-बयाँ बज़्म-ए-क़ुदरत में हूँ तस्वीर की सूरत हैराँ दिल में इक रंग है लफ़्ज़ों से जो होता है अयाँ लय की मुहताज नहीं है मिरी फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ शौक़-ए-शोहरत हवस-ए-गर्मी-ए-बाज़ार नहीं दिल वो यूसुफ़ है जिसे फ़िक्र-ए-ख़रीदार नहीं और होंगे जिन्हें रहता है मुक़द्दर से गिला और होंगे जिन्हें मिलता नहीं मेहनत का सिला मैं ने जो ग़ैब की सरकार से माँगा वो मिला जो अक़ीदा था मिरे दिल का हिलाए न हिला क्यूँँ डराते हैं अबस गबरू मुसलमाँ मुझ को क्या मिटाएगी भला गर्दिश-ए-दौराँ मुझ को क्या ज़माना पे खुले बे-ख़बरी का मिरी राज़ ताइर-ए-फ़िक्र में पैदा तो हो इतनी परवाज़ क्यूँँ तबीअ'त को न हो बे-ख़ुदी-ए-शौक़ पे नाज़ हज़रत-ए-अब्र के क़दमों पे है ये फ़र्क़-ए-नियाज़ फ़ख़्र है मुझ को उसी दर से शरफ़ पाने का मैं शराबी हूँ उसी रिंद के मयख़ाने का दिल मिरा दौलत-ए-दुनिया का तलबगार नहीं ब-ख़ुदा ख़ाक-नशीनी से मुझे आर नहीं मस्त हूँ हुब्ब-ए-वतन से कोई मय-ख़्वार नहीं मुझ को मग़रिब की नुमाइश से सरोकार नहीं अपने ही दिल का पियाला पिए मदहोश हूँ मैं झूटी पीता नहीं मग़रिब की वो मय-नोश हूँ मैं क़ौम के दर्द से हूँ सोज़-ए-वफ़ा की तस्वीर मेरी रग रग से है पैदा तप-ए-ग़म की तासीर है मगर आज नज़र में वो बहार-ए-दिल-गीर कर दिया दिल को फ़रिश्तों ने तरब के तस्ख़ीर ये नसीम-ए-सहरी आज ख़बर लाई है साल गुज़रा मिरे गुलशन में बहार आई है क़ौम में आठ बरस से है ये गुलशन शादाब चेहरा-ए-गुल पे यहाँ पास-ए-अदब की है नक़ाब मेरे आईना-ए-दिल में है फ़क़त इस का जवाब उस के काँटों पे किया मैं ने निसार अपना शबाब काम शबनम का लिया दीदा-ए-तर से अपने मैं ने सींचा है उसे ख़ून-ए-जिगर से अपने हर बरस रंग पे आता ही गया ये गुलज़ार फूल तहज़ीब के खिलते गए मिटते गए ख़ार पत्ती पत्ती से हुआ रंग-ए-वफ़ा का इज़हार नौजवानान-ए-चमन बन गए तस्वीर-ए-बहार रंग-ए-गुल देख के दिल क़ौम का दीवाना हुआ जो था बद-ख़्वाह-ए-चमन सब्ज़ा-ए-बेगाना हुआ बू-ए-नख़वत से नहीं याँ के गुलों को सरोकार है बुज़ुर्गों का अदब इन की जवानी का सिंगार इल्म-ओ-ईमाँ की तरावत का दिलों में है गुज़ार धो गए चश्मा-ए-अख़लाक़ से सीनों के ग़ुबार रंग दिखलाती है यूँँ दिल की सफ़ा यारों में रौशनी सुब्ह की जिस तरह हो गुलज़ारों में किस को मा'लूम थी इस गुलशन-ए-अख़्लाक़ की राह मैं ने फूलों को किया रंग-ए-वफ़ा से आगाह अब तो इस बाग़ पे है सब की मोहब्बत की निगाह जो कि पौदे थे शजर हो गए माशा-अल्लाह क्या कहूँ रंग-ए-जवानी में जो इस राग के थे बाग़बाँ हो गए गुलचीं जो मेरे बाग़ के थे गो कि बाक़ी नहीं कैफ़िय्यत-ए-तूफ़ान-ए-शबाब फँस के जंजाल में दुनिया के ये क़िस्सा हुआ ख़्वाब मस्त रहता है मगर अब भी दिल-ए-ख़ाना-ख़राब शाम को बैठ के महफ़िल में लुंढाता हूँ शराब नश्शा-ए-इल्म की उम्मीद पे जीने वाले सिमट आते हैं सर-ए-शाम से पीने वाले और ही रंग पे है आज बहार-ए-गुलशन सैर के वास्ते आए हैं अज़ीज़ान-ए-वतन फ़र्श आँखें किए बैठे हैं जवानान-ए-चमन दिल में तूफ़ान-ए-तरब लब पे मोहब्बत के सुख़न कौन है आज जो इस बज़्म में मसरूर नहीं रूह-ए-सरशार भी खिंच आए तो कुछ दूर नहीं मगर अफ़्सोस ये दुनिया है मक़ाम-ए-इबरत रंज की याद दिलाता है ख़याल-ए-राहत आज याद आती है उन फूलों की मुझ को सूरत खिलते ही कर गए जो मेरे चमन से रेहलत चश्म-ए-बद-दूर गुलों की ये भरी डाली है चंद फूलों की मगर इस में जगह ख़ाली है ये वो गुल थे जिन्हें अरबाब-ए-नज़र ने रोया भाई ने बहनों ने मादर ने पिदर ने रोया ख़ाक रोना था जो इस दीदा-ए-तर ने रोया मुद्दतों इन को मिरे क़ल्ब-ओ-जिगर ने रोया दिल के कुछ दाग़-ए-मोहब्बत हैं निशानी उन की बचपना देख के देखी न जवानी उन की ख़ैर दुनिया में कभी सोज़ है और कभी है साज़ नौनिहालान-ए-चमन की रहे अब उम्र दराज़ भाई से बढ़ के मुझे हैं ये मेरे माया-नाज़ मेरे मोनिस हैं यही और यही मेरे हमराज़ मर के भी रूह मिरी दिल की तरह शाद रहे मैं रहूँ या न रहूँ ये चमन आबाद रहे — Chakbast Brij Narayan
है दिलाती याद मय-नोशी फ़ज़ा बरसात की दिल बढ़ा जाती है आ आ कर घटा बरसात की बंध गई है रहमत-ए-हक़ से हवा बरसात की नाम खुलने का नहीं लेती घटा बरसात की उग रहा है हर तरफ़ सब्ज़ा दर-ओ-दीवार पर इंतिहा गर्मी की है और इब्तिदा बरसात की देखना सूखी हुई शाख़ों में भी जान आ गई हक़ में पौदों के मसीहा है हवा बरसात की हों शरीक-ए-बज़्म-ए-मय ज़ाहिद भी तौबा तोड़ कर झूमती क़िबले से उट्ठी है घटा बरसात की अस्ल तो ये है मय-ओ-माशूक़ का जब लुत्फ़ है चाँदनी हो रात को दिन को घटा बरसात की वो पपीहों की सदाएँ और वो मोरों का रक़्स वो हवा-ए-सर्व और काली घटा बरसात की पार उतर जाएँगे बहर-ए-ग़म से रिंद-ए-बादा-नोश ले उड़ेगी कश्ती-ए-मय को हवा बरसात की ख़ुद-ब-ख़ुद ताज़ा उमंगें जोश पर आने लगीं दिल को गरमाने लगी ठंडी हवा बरसात की वो दुआएँ मय-कशों की और वो लुत्फ़-ए-इंतिज़ार हाए किन नाज़ों से चलती है हवा बरसात की मैं ये समझा अब्र के रंगीन टुकड़े देख कर तख़्त परियों के उड़ लाई हवा बरसात की नाज़ हो जिस को बहार-ए-मिस्र-ओ-शाम-ओ-रूम पर सर-ज़मीन-ए-हिंद में देखे फ़ज़ा बरसात की — Chakbast Brij Narayan
ऐ ख़ाक-ए-हिंद तेरी अज़्मत में क्या गुमाँ है दरिया-ए-फ़ैज़-ए-क़ुदरत तेरे लिए रवाँ है तेरे जबीं से नूर-ए-हुस्न-ए-अज़ल अयाँ है अल्लाह-रे ज़ेब-ओ-ज़ीनत क्या औज-ए-इज़्ज़-ओ-शाँ है हर सुब्ह है ये ख़िदमत ख़ुर्शीद-ए-पुर-ज़िया की किरनों से गूँधता है चोटी हिमालिया की इस ख़ाक-ए-दिल-नशीं से चश्में हुए वो जारी चीन ओ अरब में जिन से होती थी आबियारी सारे जहाँ पे जब था वहशत का अब्र तारी चश्म-ओ-चराग़-ए-आलम थी सर-ज़मीं हमारी शम-ए-अदब न थी जब यूनाँ की अंजुमन में ताबाँ था महर-ए-दानिश इस वादी-ए-कुहन में 'गौतम' ने आबरू दी इस माबद-ए-कुहन को 'सरमद' ने इस ज़मीं पर सदक़े किया वतन को 'अकबर' ने जाम-ए-उल्फ़त बख़्शा इस अंजुमन को सींचा लहू से अपने 'राणा' ने इस चमन को सब सूरबीर अपने इस ख़ाक में निहाँ हैं टूटे हुए खंडर हैं या उन की हड्डियाँ हैं दीवार-ओ-दर से अब तक उन का असर अयाँ है अपनी रगों में अब तक उन का लहू रवाँ है अब तक असर में डूबी नाक़ूस की फ़ुग़ाँ है फ़िरदौस-ए-गोश अब तक कैफ़िय्यत-ए-अज़ाँ है कश्मीर से अयाँ है जन्नत का रंग अब तक शौकत से बह रहा है दरिया-ए-गंग अब तक अगली सी ताज़गी है फूलों में और फलों में करते हैं रक़्स अब तक ताऊस जंगलों में अब तक वही कड़क है बिजली की बादलों में पस्ती सी आ गई है पर दिल के हौसलों में गुल शम-ए-अंजुमन है गो अंजुमन वही है हुब्ब-ए-वतन वही है ख़ाक-ए-वतन वही है बरसों से हो रहा है बरहम समाँ हमारा दुनिया से मिट रहा है नाम-ओ-निशाँ हमारा कुछ कम नहीं अजल से ख़्वाब-ए-गिराँ हमारा इक लाश-ए-बे-कफ़न है हिन्दोस्तान हमारा इल्म-ओ-कमाल ओ ईमाँ बर्बाद हो रहे हैं ऐश-ओ-तरब के बंदे ग़फ़लत में सो रहे हैं ऐ सूर-ए-हुब्ब-ए-क़ौमी इस ख़्वाब से जगा दे भूला हुआ फ़साना कानों को फिर सुना दे मुर्दा तबीअतों की अफ़्सुर्दगी मिटा दे उठते हुए शरारे इस राख से दिखा दे हुब्ब-ए-वतन समाए आँखों में नूर हो कर सर में ख़ुमार हो कर दिल में सुरूर हो कर शैदा-ए-बोस्ताँ को सर्व-ओ-समन मुबारक रंगीं तबीअतों को रंग-ए-सुख़न मुबारक बुलबुल को गुल मुबारक गुल को चमन मुबारक हम बे-कसों को अपना प्यारा वतन मुबारक ग़ुंचे हमारे दिल के इस बाग़ में खिलेंगे इस ख़ाक से उठे हैं इस ख़ाक में मिलेंगे है जू-ए-शीर हम को नूर-ए-सहर वतन का आँखों की रौशनी है जल्वा इस अंजुमन का है रश्क-ए-महर ज़र्रा इस मंज़िल-ए-कुहन का तुलता है बर्ग-ए-गुल से काँटा भी इस चमन का गर्द-ओ-ग़ुबार याँ का ख़िलअत है अपने तन को मर कर भी चाहते हैं ख़ाक-ए-वतन कफ़न को — Chakbast Brij Narayan