na koi dost dushman ho shareek-e-dard-o-gham mera | न कोई दोस्त दुश्मन हो शरीक-ए-दर्द-ओ-ग़म मेरा

  - Chakbast Brij Narayan

न कोई दोस्त दुश्मन हो शरीक-ए-दर्द-ओ-ग़म मेरा
सलामत मेरी गर्दन पर रहे बार-ए-अलम मेरा

लिखा ये दावर-ए-महशर ने मेरी फ़र्द-ए-इसयाँ पर
ये वो बंदा है जिस पर नाज़ करता है करम मेरा

कहा ग़ुंचा ने हँस कर वाह क्या नैरंग-ए-आलम है
वजूद गुल जिसे समझे हैं सब है वो अदम मेरा

कशाकश है उम्मीद-ओ-यास की ये ज़िंदगी क्या है
इलाही ऐसी हस्ती से तो अच्छा था अदम मेरा

दिल-ए-अहबाब में घर है शगुफ़्ता रहती है ख़ातिर
यही जन्नत है मेरी और यही बाग़-ए-इरम मेरा

मुझे अहबाब की पुर्सिश की ग़ैरत मार डालेगी
क़यामत है अगर इफ़शा हुआ राज़-ए-अलम मेरा

खड़ी थीं रास्ता रोके हुए लाखों तमन्नाएँ
शहीद-ए-यास हूँ निकला है किस मुश्किल से दम मेरा

ख़ुदा ने इल्म बख़्शा है अदब अहबाब करते हैं
यही दौलत है मेरी और यही जाह-ओ-हशम मेरा

ज़बान-ए-हाल से ये लखनऊ की ख़ाक कहती है
मिटाया गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने जाह-ओ-हशम मेरा

किया है फ़ाश पर्दा कुफ़्र-ओ-दीं का इस क़दर मैं ने
कि दुश्मन है बरहमन और अदू शैख़-ए-हरम मेरा

  - Chakbast Brij Narayan

Khuddari Shayari

Our suggestion based on your choice

    हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ
    आख़िर मिरे मिज़ाज में क्यूँ दख़्ल दे कोई
    Jaun Elia
    52 Likes
    तेरी ख़ता नहीं जो तू ग़ुस्से में आ गया
    पैसे का ज़ो'म था तेरे लहजे में आ गया

    सिक्का उछालकर के तेरे पास क्या बचा
    तेरा ग़ुरूर तो मेरे काँसे में आ गया
    Read Full
    Mehshar Afridi
    71 Likes
    गर अदीबों को अना का रोग लग जाये तो फिर
    गुल मोहब्बत के अदब की शाख़ पर खिलते नहीं
    Afzal Ali Afzal
    दिन रात मय-कदे में गुज़रती थी ज़िंदगी
    'अख़्तर' वो बे-ख़ुदी के ज़माने किधर गए
    Akhtar Shirani
    21 Likes
    बे-ख़ुदी ले गई कहाँ हम को
    देर से इंतिज़ार है अपना
    Meer Taqi Meer
    39 Likes
    तू मोहब्बत नहीं समझती है
    हम भी अपनी अना में जलते हैं

    इस दफा बंदिशें ज़ियादा हैं
    छोड़ अगले जनम में मिलते हैं
    Read Full
    Ritesh Rajwada
    54 Likes
    ग़ुरूर-ए-लुत्फ़-ए-साक़ी नश्शा-ए-बे-बाकी-ए-मस्ताँ
    नम-ए-दामान-ए-इस्याँ है तरावत मौज-ए-कौसर की
    Mirza Ghalib
    28 Likes
    होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
    इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
    Nida Fazli
    144 Likes
    अगर तुम्हारी अना ही का है सवाल तो फिर
    चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए
    Ahmad Faraz
    47 Likes
    हर किसी से ही मुहब्बत माँगता है
    दिल तो अब सबसे अक़ीदत माँगता है

    सीख आया है सलीक़ा ग़ुफ़्तगू का
    मुझसे मेरा दोस्त इज्ज़त माँगता है
    Read Full

More by Chakbast Brij Narayan

As you were reading Shayari by Chakbast Brij Narayan

    मिरी बे-ख़ुदी है वो बे-ख़ुदी कि ख़ुदी का वहम-ओ-गुमाँ नहीं
    ये सुरूर-ए-साग़र-ए-मय नहीं ये ख़ुमार-ए-ख़्वाब-ए-गिराँ नहीं

    जो ज़ुहूर-ए-आलम-ए-ज़ात है ये फ़क़त हुजूम-ए-सिफ़ात है
    है जहाँ का और वजूद क्या जो तिलिस्म-ए-वहम-ओ-गुमाँ नहीं

    ये हयात आलम-ए-ख़्वाब है न गुनाह है न सवाब है
    वही कुफ़्र-ओ-दीं में ख़राब है जिसे इल्म-ए-राज़-ए-जहाँ नहीं

    न वो ख़ुम में बादे का जोश है न वो हुस्न जल्वा-फ़रोश है
    न किसी को रात का होश है वो सहर कि शब का गुमाँ नहीं

    वो ज़मीं पे जिन का था दबदबा कि बुलंद अर्श पे नाम था
    उन्हें यूँ फ़लक ने मिटा दिया कि मज़ार तक का निशाँ नहीं
    Read Full
    Chakbast Brij Narayan
    अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता
    न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता

    बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा में परा होता
    जिधर उठती नज़र कोसों तलक जंगल हरा होता

    मय-ए-गुल-रंग लुटती यूँ दर-ए-मय-ख़ाना वा होता
    न पीने की कमी होती न साक़ी से गिला होता

    हज़ारों जान देते हैं बुतों की बेवफ़ाई पर
    अगर उन में से कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता

    रुलाया अहल-ए-महफ़िल को निगाह-ए-यास ने मेरी
    क़यामत थी जो इक क़तरा इन आँखों से जुदा होता

    ख़ुदा को भूल कर इंसान के दिल का ये आलम है
    ये आईना अगर सूरत-नुमा होता तो क्या होता

    अगर दम भर भी मिट जाती ख़लिश ख़ार-ए-तमन्ना की
    दिल-ए-हसरत-तलब को अपनी हस्ती से गिला होता
    Read Full
    Chakbast Brij Narayan
    कभी था नाज़ ज़माने को अपने हिन्द पे भी
    पर अब उरूज वो इल्म-ओ-कमाल-ओ-फ़न में नहीं

    रगों में ख़ूँ है वही दिल वही जिगर है वही
    वही ज़बाँ है मगर वो असर सुख़न में नहीं

    वही है बज़्म वही शम्अ' है वही फ़ानूस
    फ़िदा-ए-बज़्म वो परवाने अंजुमन में नहीं

    वही हवा वही कोयल वही पपीहा है
    वही चमन है प वो बाग़बाँ चमन में नहीं

    ग़ुरूर-ए-जेहल ने हिन्दोस्ताँ को लूट लिया
    ब-जुज़ निफ़ाक़ के अब ख़ाक भी वतन में नहीं
    Read Full
    Chakbast Brij Narayan
    नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं
    वतन की आबरू अहल-ए-वतन बरबाद करते हैं

    हवा में उड़ के सैर-ए-आलम-ए-ईजाद करते हैं
    फ़रिश्ते दंग हैं वो काम आदम-ज़ाद करते हैं

    नया मस्लक नया रंग-ए-सुख़न ईजाद करते हैं
    उरूस-ए-शेर को हम क़ैद से आज़ाद करते हैं

    मता-ए-पास-ए-ग़ैरत‍‍‍ बुल-हवस बरबाद करते हैं
    लब-ए-ख़ामोश को शर्मिंदा-ए-फ़र्याद करते हैं

    हवा-ए-ताज़ा पा कर बोस्ताँ को याद करते हैं
    असीरान-ए-क़फ़स वक़्त-ए-सहर फ़रियाद करते हैं

    ज़रा ऐ कुंज-ए-मरक़द याद रखना उस हमिय्यत को
    कि घर वीरान कर के हम तुझे आबाद करते हैं

    हर इक ख़िश्त-ए-कुहन अफ़्साना-ए-देरीना कहती है
    ज़बान-ए-हाल से टूटे खंडर फ़रियाद करते हैं

    बला-ए-जाँ हैं ये तस्बीह और ज़ुन्नार के फंदे
    दिल-ए-हक़-बीं को हम इस क़ैद से आज़ाद करते हैं

    अज़ाँ देते हैं बुत-ख़ाने में जा कर शान-ए-मोमिन से
    हरम के नारा-ए-नाक़ूस हम ईजाद करते हैं

    निकल कर अपने क़ालिब से नया क़ालिब बसाएगी
    असीरी के लिए हम रूह को आज़ाद करते हैं

    मोहब्बत के चमन में मजमा-ए-अहबाब रहता है
    नई जन्नत इसी दुनिया में हम आबाद करते हैं

    नहीं घटती मिरी आँखों में तारीकी शब-ए-ग़म की
    ये तारे रौशनी अपनी अबस बरबाद करते हैं

    थके-माँदे मुसाफ़िर ज़ुल्मत-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ में
    बहार-ए-जल्वा-ए-सुब्ह-ए-वतन को याद करते हैं

    दिल-ए-नाशाद रोता है ज़बाँ उफ़ कर नहीं सकती
    कोई सुनता नहीं यूँ बे-नवा फ़रियाद करते हैं

    जनाब-ए-शैख़ को ये मश्क़ है याद-ए-इलाही की
    ख़बर होती नहीं दिल को ज़बाँ से याद करते हैं

    नज़र आती है दुनिया इक इबादत-गाह-ए-नूरानी
    सहर का वक़्त है बंदे ख़ुदा को याद करते हैं

    सबक़ उम्र-ए-रवाँ का दिल-नशीं होने नहीं पाता
    हमेशा भूलते जाते हैं जो कुछ याद करते हैं

    ज़माने का मोअल्लिम इम्तिहाँ उन का नहीं करता
    जो आँखें खोल कर ये दर्स-ए-हस्ती याद करते हैं

    अदब ता'लीम का जौहर है ज़ेवर है जवानी का
    वही शागिर्द हैं जो ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं

    न जानी क़द्र तेरी उम्र-ए-रफ़्ता हम ने कॉलेज में
    निकल आते हैं आँसू अब तुझे जब याद करते हैं
    Read Full
    Chakbast Brij Narayan
    ज़बाँ को बंद करें या मुझे असीर करें
    मिरे ख़याल को बेड़ी पिन्हा नहीं सकते

    ये कैसी बज़्म है और कैसे उस के साक़ी हैं
    शराब हाथ में है और पिला नहीं सकते

    ये बेकसी भी अजब बेकसी है दुनिया में
    कोई सताए हमें हम सता नहीं सकते

    कशिश वफ़ा की उन्हें खींच लाई आख़िर-कार
    ये था रक़ीब को दा'वा वो आ नहीं सकते

    जो तू कहे तो शिकायत का ज़िक्र कम कर दें
    मगर यक़ीं तिरे वा'दों पे ला नहीं सकते

    चराग़ क़ौम का रौशन है अर्श पर दिल के
    उसे हवा के फ़रिश्ते बुझा नहीं सकते
    Read Full
    Chakbast Brij Narayan

Similar Writers

our suggestion based on Chakbast Brij Narayan

Similar Moods

As you were reading Khuddari Shayari Shayari