सदा ये आती है फल फूल और पत्थर से
ज़मीं पे ताज गिरा क़ौम-ए-हिन्द के सर से
हबीब क़ौम का दुनिया से यूँ रवाना हुआ
ज़मीं उलट गई क्या मुंक़लिब ज़माना हुआ
बढ़ी हुई थी नहूसत ज़वाल-ए-पैहम की
तिरे ज़ुहूर से तक़दीर क़ौम की चमकी
निगाह-ए-यास थी हिंदुस्ताँ पे आलम की
अजीब शय थी मगर रौशनी तिरे दम की
तुझी को मुल्क में रौशन दिमाग़ समझे थे
तुझे ग़रीब के घर का चराग़ समझे थे
वतन को तू ने सँवारा किस आब-ओ-ताब के साथ
सहर का नूर बढ़े जैसे आफ़्ताब के साथ
चुने रिफ़ाह के गुल हुस्न-ए-इंतिख़ाब के साथ
शबाब क़ौम का चमका तिरे शबाब के साथ
जो आज नश्व-ओ-नुमा का नया ज़माना है
ये इंक़लाब तिरी उम्र का फ़साना है
रहा मिज़ाज में सौदा-ए-क़ौम ख़ू हो कर
वतन का इश्क़ रहा दिल की आरज़ू हो कर
बदन में जान रही वक़्फ़-ए-आबरू हो कर
रगों में जोश-ए-मोहब्बत रहे लहू हो हो कर
ख़ुदा के हुक्म से जब आब-ओ-गिल बना तेरा
किसी शहीद की मिट्टी से दिल बना तेरा
वतन की जान पे क्या क्या तबाहियाँ आईं
उमँड उमँड के जिहालत की बदलियाँ आईं
चराग़-ए-अम्न बुझाने को आँधियाँ आईं
दिलों में आग लगाने को बिजलियाँ आईं
इस इंतिशार में जिस नूर का सहारा था
उफ़ुक़ पे क़ौम के वो एक ही सितारा था
हदीस-ए-क़ौम बनी थी तिरी ज़बाँ के लिए
ज़बाँ मिली थी मोहब्बत की दास्ताँ के लिए
ख़ुदा ने तुझ को पयम्बर किया यहाँ के लिए
कि तेरे हाथ में नाक़ूस था अज़ाँ के लिए
वतन की ख़ाक तिरी बारगाह-ए-आला' है
हमें यही नई मस्जिद नया शिवाला है
ग़रीब हिन्द ने तन्हा नहीं ये दाग़ सहा
वतन से दूर भी तूफ़ान रंज-ओ-ग़म का उठा
हबीब क्या हैं हरीफ़ों ने ये ज़बाँ से कहा
सफ़ीर-ए-क़ौम जिगर-बंद-ए-सल्तनत न रहा
पयाम शह ने दिया रस्म-ए-ताज़ियत के लिए
कि तू सुतून था ऐवान-ए-सल्तनत के लिए
दिलों में नक़्श हैं अब तक तिरी ज़बाँ के सुख़न
हमारी राह में गोया चराग़ हैं रौशन
फ़क़ीर थे जो तिरे दर के ख़ादिमान-ए-वतन
उन्हें नसीब कहाँ होगा अब तिरा दामन
तिरे अलम में वो इस तरह जान खोते हैं
कि जैसे बाप से छुट कर यतीम रोते हैं
अजल के दाम में आना है यूँ तो आलम को
मगर ये दिल नहीं तय्यार तेरे मातम को
पहाड़ कहते हैं दुनिया में ऐसे ही ग़म को
मिटा के तुझ को अजल ने मिटा दिया हम को
जनाज़ा हिन्द का दर से तिरे निकलता है
सुहाग क़ौम का तेरी चिता में जलता है
रहेगा रंज ज़माने में यादगार तिरा
वो कौन दिल है कि जिस में नहीं मज़ार तिरा
जो कल रक़ीब था है आज सोगवार तिरा
ख़ुदा के सामने है मुल्क शर्मसार तिरा
पली है क़ौम तिरे साया-ए-करम के तले
हमें नसीब थी जन्नत तिरे क़दम के तले
Read Fullज़मीं पे ताज गिरा क़ौम-ए-हिन्द के सर से
हबीब क़ौम का दुनिया से यूँ रवाना हुआ
ज़मीं उलट गई क्या मुंक़लिब ज़माना हुआ
बढ़ी हुई थी नहूसत ज़वाल-ए-पैहम की
तिरे ज़ुहूर से तक़दीर क़ौम की चमकी
निगाह-ए-यास थी हिंदुस्ताँ पे आलम की
अजीब शय थी मगर रौशनी तिरे दम की
तुझी को मुल्क में रौशन दिमाग़ समझे थे
तुझे ग़रीब के घर का चराग़ समझे थे
वतन को तू ने सँवारा किस आब-ओ-ताब के साथ
सहर का नूर बढ़े जैसे आफ़्ताब के साथ
चुने रिफ़ाह के गुल हुस्न-ए-इंतिख़ाब के साथ
शबाब क़ौम का चमका तिरे शबाब के साथ
जो आज नश्व-ओ-नुमा का नया ज़माना है
ये इंक़लाब तिरी उम्र का फ़साना है
रहा मिज़ाज में सौदा-ए-क़ौम ख़ू हो कर
वतन का इश्क़ रहा दिल की आरज़ू हो कर
बदन में जान रही वक़्फ़-ए-आबरू हो कर
रगों में जोश-ए-मोहब्बत रहे लहू हो हो कर
ख़ुदा के हुक्म से जब आब-ओ-गिल बना तेरा
किसी शहीद की मिट्टी से दिल बना तेरा
वतन की जान पे क्या क्या तबाहियाँ आईं
उमँड उमँड के जिहालत की बदलियाँ आईं
चराग़-ए-अम्न बुझाने को आँधियाँ आईं
दिलों में आग लगाने को बिजलियाँ आईं
इस इंतिशार में जिस नूर का सहारा था
उफ़ुक़ पे क़ौम के वो एक ही सितारा था
हदीस-ए-क़ौम बनी थी तिरी ज़बाँ के लिए
ज़बाँ मिली थी मोहब्बत की दास्ताँ के लिए
ख़ुदा ने तुझ को पयम्बर किया यहाँ के लिए
कि तेरे हाथ में नाक़ूस था अज़ाँ के लिए
वतन की ख़ाक तिरी बारगाह-ए-आला' है
हमें यही नई मस्जिद नया शिवाला है
ग़रीब हिन्द ने तन्हा नहीं ये दाग़ सहा
वतन से दूर भी तूफ़ान रंज-ओ-ग़म का उठा
हबीब क्या हैं हरीफ़ों ने ये ज़बाँ से कहा
सफ़ीर-ए-क़ौम जिगर-बंद-ए-सल्तनत न रहा
पयाम शह ने दिया रस्म-ए-ताज़ियत के लिए
कि तू सुतून था ऐवान-ए-सल्तनत के लिए
दिलों में नक़्श हैं अब तक तिरी ज़बाँ के सुख़न
हमारी राह में गोया चराग़ हैं रौशन
फ़क़ीर थे जो तिरे दर के ख़ादिमान-ए-वतन
उन्हें नसीब कहाँ होगा अब तिरा दामन
तिरे अलम में वो इस तरह जान खोते हैं
कि जैसे बाप से छुट कर यतीम रोते हैं
अजल के दाम में आना है यूँ तो आलम को
मगर ये दिल नहीं तय्यार तेरे मातम को
पहाड़ कहते हैं दुनिया में ऐसे ही ग़म को
मिटा के तुझ को अजल ने मिटा दिया हम को
जनाज़ा हिन्द का दर से तिरे निकलता है
सुहाग क़ौम का तेरी चिता में जलता है
रहेगा रंज ज़माने में यादगार तिरा
वो कौन दिल है कि जिस में नहीं मज़ार तिरा
जो कल रक़ीब था है आज सोगवार तिरा
ख़ुदा के सामने है मुल्क शर्मसार तिरा
पली है क़ौम तिरे साया-ए-करम के तले
हमें नसीब थी जन्नत तिरे क़दम के तले
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ये हिन्दोस्ताँ है हमारा वतन
मोहब्बत की आँखों का तारा वतन
मोहब्बत की आँखों का तारा वतन
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
वो इस के दरख़्तों के तय्यारियाँ
वो फल फूल पौदे वो फुल-वारियाँ
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
हवा में दरख़्तों का वो झूमना
वो पत्तों का फूलों का मुँह चूमना
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
वो सावन में काली घटा की बहार
वो बरसात की हल्की हल्की फुवार
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
वो बाग़ों में कोयल वो जंगल के मोर
वो गंगा की लहरें वो जमुना का ज़ोर
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
इसी से है इस ज़िंदगी की बहार
वतन की मोहब्बत हो या माँ का प्यार
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
Read Fullवो इस के दरख़्तों के तय्यारियाँ
वो फल फूल पौदे वो फुल-वारियाँ
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
हवा में दरख़्तों का वो झूमना
वो पत्तों का फूलों का मुँह चूमना
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
वो सावन में काली घटा की बहार
वो बरसात की हल्की हल्की फुवार
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
वो बाग़ों में कोयल वो जंगल के मोर
वो गंगा की लहरें वो जमुना का ज़ोर
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
इसी से है इस ज़िंदगी की बहार
वतन की मोहब्बत हो या माँ का प्यार
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
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तेरे जबीं से नूर-ए-हुस्न-ए-अज़ल अयाँ है
अल्लाह-रे ज़ेब-ओ-ज़ीनत क्या औज-ए-इज़्ज़-ओ-शाँ है
हर सुब्ह है ये ख़िदमत ख़ुर्शीद-ए-पुर-ज़िया की
किरनों से गूँधता है चोटी हिमालिया की
इस ख़ाक-ए-दिल-नशीं से चश्में हुए वो जारी
चीन ओ अरब में जिन से होती थी आबियारी
सारे जहाँ पे जब था वहशत का अब्र तारी
चश्म-ओ-चराग़-ए-आलम थी सर-ज़मीं हमारी
शम-ए-अदब न थी जब यूनाँ की अंजुमन में
ताबाँ था महर-ए-दानिश इस वादी-ए-कुहन में
'गौतम' ने आबरू दी इस माबद-ए-कुहन को
'सरमद' ने इस ज़मीं पर सदक़े किया वतन को
'अकबर' ने जाम-ए-उल्फ़त बख़्शा इस अंजुमन को
सींचा लहू से अपने 'राणा' ने इस चमन को
सब सूरबीर अपने इस ख़ाक में निहाँ हैं
टूटे हुए खंडर हैं या उन की हड्डियाँ हैं
दीवार-ओ-दर से अब तक उन का असर अयाँ है
अपनी रगों में अब तक उन का लहू रवाँ है
अब तक असर में डूबी नाक़ूस की फ़ुग़ाँ है
फ़िरदौस-ए-गोश अब तक कैफ़िय्यत-ए-अज़ाँ है
कश्मीर से अयाँ है जन्नत का रंग अब तक
शौकत से बह रहा है दरिया-ए-गंग अब तक
अगली सी ताज़गी है फूलों में और फलों में
करते हैं रक़्स अब तक ताऊस जंगलों में
अब तक वही कड़क है बिजली की बादलों में
पस्ती सी आ गई है पर दिल के हौसलों में
गुल शम-ए-अंजुमन है गो अंजुमन वही है
हुब्ब-ए-वतन वही है ख़ाक-ए-वतन वही है
बरसों से हो रहा है बरहम समाँ हमारा
दुनिया से मिट रहा है नाम-ओ-निशाँ हमारा
कुछ कम नहीं अजल से ख़्वाब-ए-गिराँ हमारा
इक लाश-ए-बे-कफ़न है हिन्दोस्तान हमारा
इल्म-ओ-कमाल ओ ईमाँ बर्बाद हो रहे हैं
ऐश-ओ-तरब के बंदे ग़फ़लत में सो रहे हैं
ऐ सूर-ए-हुब्ब-ए-क़ौमी इस ख़्वाब से जगा दे
भूला हुआ फ़साना कानों को फिर सुना दे
मुर्दा तबीअतों की अफ़्सुर्दगी मिटा दे
उठते हुए शरारे इस राख से दिखा दे
हुब्ब-ए-वतन समाए आँखों में नूर हो कर
सर में ख़ुमार हो कर दिल में सुरूर हो कर
शैदा-ए-बोस्ताँ को सर्व-ओ-समन मुबारक
रंगीं तबीअतों को रंग-ए-सुख़न मुबारक
बुलबुल को गुल मुबारक गुल को चमन मुबारक
हम बे-कसों को अपना प्यारा वतन मुबारक
ग़ुंचे हमारे दिल के इस बाग़ में खिलेंगे
इस ख़ाक से उठे हैं इस ख़ाक में मिलेंगे
है जू-ए-शीर हम को नूर-ए-सहर वतन का
आँखों की रौशनी है जल्वा इस अंजुमन का
है रश्क-ए-महर ज़र्रा इस मंज़िल-ए-कुहन का
तुलता है बर्ग-ए-गुल से काँटा भी इस चमन का
गर्द-ओ-ग़ुबार याँ का ख़िलअत है अपने तन को
मर कर भी चाहते हैं ख़ाक-ए-वतन कफ़न को
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मंज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतिज़ाम
दामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलाम
इज़हार-ए-बे-कसी से सितम होगा और भी
देखा हमें उदास तो ग़म होगा और भी
दिल को सँभालता हुआ आख़िर वो नौनिहाल
ख़ामोश माँ के पास गया सूरत-ए-ख़याल
देखा तो एक दर में है बैठी वो ख़स्ता-हाल
सकता सा हो गया है ये है शिद्दत-ए-मलाल
तन में लहू का नाम नहीं ज़र्द रंग है
गोया बशर नहीं कोई तस्वीर-ए-संग है
क्या जाने किस ख़याल में गुम थी वो बे-गुनाह
नूर-ए-नज़र ये दीदा-ए-हसरत से की निगाह
जुम्बिश हुई लबों को भरी एक सर्द आह
ली गोशा-हा-ए-चश्म से अश्कों ने रुख़ की राह
चेहरे का रंग हालत-ए-दिल खोलने लगा
हर मू-ए-तन ज़बाँ की तरह बोलने लगा
आख़िर असीर-ए-यास का क़ुफ़्ल-ए-दहन खुला
अफ़्साना-ए-शदाइद-ए-रंज-ओ-मेहन खुला
इक दफ़्तर-ए-मज़ालिम-ए-चर्ख़-ए-कुहन खुला
वा था दहान-ए-ज़ख़्म कि बाब-ए-सुख़न खुला
दर्द-ए-दिल-ए-ग़रीब जो सर्फ़-ए-बयाँ हुआ
ख़ून-ए-जिगर का रंग सुख़न से अयाँ हुआ
रो कर कहा ख़मोश खड़े क्यूँ हो मेरी जाँ
मैं जानती हूँ जिस लिए आए हो तुम यहाँ
सब की ख़ुशी यही है तो सहरा को हो रवाँ
लेकिन मैं अपने मुँह से न हरगिज़ कहूँगी हाँ
किस तरह बन में आँखों के तारे को भेज दूँ
जोगी बना के राज-दुलारे को भेज दूँ
दुनिया का हो गया है ये कैसा लहू सपीद
अंधा किए हुए है ज़र-ओ-माल की उमीद
अंजाम क्या हो कोई नहीं जानता ये भेद
सोचे बशर तो जिस्म हो लर्ज़ां मिसाल-ए-बीद
लिक्खी है क्या हयात-ए-अबद इन के वास्ते
फैला रहे हैं जाल ये किस दिन के वास्ते
लेती किसी फ़क़ीर के घर में अगर जनम
होते न मेरी जान को सामान ये बहम
डसता न साँप बन के मुझे शौकत-ओ-हशम
तुम मेरे लाल थे मुझे किस सल्तनत से कम
मैं ख़ुश हूँ फूँक दे कोई इस तख़्त-ओ-ताज को
तुम ही नहीं तो आग लगा दूँगी राज को
किन किन रियाज़तों से गुज़ारे हैं माह-ओ-साल
देखी तुम्हारी शक्ल जब ऐ मेरे नौनिहाल
पूरा हुआ जो ब्याह का अरमान था कमाल
आफ़त ये आई मुझ पे हुए जब सफ़ेद बाल
छटती हूँ उन से जोग लिया जिन के वास्ते
क्या सब किया था मैं ने इसी दिन के वास्ते
ऐसे भी ना-मुराद बहुत आएँगे नज़र
घर जिन के बे-चराग़ रहे आह उम्र भर
रहता मिरा भी नख़्ल-ए-तमन्ना जो बे-समर
ये जा-ए-सब्र थी कि दुआ में नहीं असर
लेकिन यहाँ तो बन के मुक़द्दर बिगड़ गया
फल फूल ला के बाग़-ए-तमन्ना उजड़ गया
सरज़द हुए थे मुझ से ख़ुदा जाने क्या गुनाह
मँझधार में जो यूँ मिरी कश्ती हुई तबाह
आती नज़र नहीं कोई अम्न-ओ-अमाँ की राह
अब याँ से कूच हो तो अदम में मिले पनाह
तक़्सीर मेरी ख़ालिक़-ए-आलम बहल करे
आसान मुझ ग़रीब की मुश्किल अजल करे
सुन कर ज़बाँ से माँ की ये फ़रियाद-ए-दर्द-ख़ेज़
उस ख़स्ता-जाँ के दिल पे चली ग़म की तेग़-ए-तेज़
आलम ये था क़रीब कि आँखें हों अश्क-रेज़
लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़
सोचा यही कि जान से बेकस गुज़र न जाए
नाशाद हम को देख के माँ और मर न जाए
फिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूर
मायूस क्यूँ हैं आप अलम का है क्यूँ वफ़ूर
सदमा ये शाक़ आलम-ए-पीरी में है ज़रूर
लेकिन न दिल से कीजिए सब्र-ओ-क़रार दूर
शायद ख़िज़ाँ से शक्ल अयाँ हो बहार की
कुछ मस्लहत इसी में हो परवरदिगार की
ये ज'अल ये फ़रेब ये साज़िश ये शोर-ओ-शर
होना जो है सब उस के बहाने हैं सर-ब-सर
अस्बाब-ए-ज़ाहिरी में न इन पर करो नज़र
क्या जाने क्या है पर्दा-ए-क़ुदरत में जल्वा-गर
ख़ास उस की मस्लहत कोई पहचानता नहीं
मंज़ूर क्या उसे है कोई जानता नहीं
राहत हो या कि रंज ख़ुशी हो कि इंतिशार
वाजिब हर एक रंग में है शुक्र-ए-किर्दगार
तुम ही नहीं हो कुश्ता-ए-नैरंग-ए-रोज़गार
मातम-कदे में दहर के लाखों हैं सोगवार
सख़्ती सही नहीं कि उठाई कड़ी नहीं
दुनिया में क्या किसी पे मुसीबत पड़ी नहीं
देखे हैं इस से बढ़ के ज़माने ने इंक़लाब
जिन से कि ब-गुनाहों की 'उम्रें हुईं ख़राब
सोज़-ए-दरूँ से क़ल्ब ओ जिगर हो गए कबाब
पीरी मिटी किसी की किसी का मिटा शबाब
कुछ बन नहीं पड़ा जो नसीबे बिगड़ गए
वो बिजलियाँ गिरीं कि भरे घर उजड़ गए
माँ बाप मुँह ही देखते थे जिन का हर घड़ी
क़ाएम थीं जिन के दम से उमीदें बड़ी बड़ी
दामन पे जिन के गर्द भी उड़ कर नहीं पड़ी
मारी न जिन को ख़्वाब में भी फूल की छड़ी
महरूम जब वो गुल हुए रंग-ए-हयात से
उन को जला के ख़ाक किया अपने हात से
कहते थे लोग देख के माँ बाप का मलाल
इन बे-कसों की जान का बचना है अब मुहाल
है किब्रिया की शान गुज़रते ही माह-ओ-साल
ख़ुद दिल से दर्द-ए-हिज्र का मिटता गया ख़याल
हाँ कुछ दिनों तो नौहा-ओ-मातम हुआ किया
आख़िर को रो के बैठ रहे और क्या किया
पड़ता है जिस ग़रीब पे रंज-ओ-मेहन का बार
करता है उस को सब्र अता आप किर्दगार
मायूस हो के होते हैं इंसाँ गुनाहगार
ये जानते नहीं वो है दाना-ए-रोज़गार
इंसान उस की राह में साबित-क़दम रहे
गर्दन वही है अम्र-ए-रज़ा में जो ख़म रहे
और आप को तो कुछ भी नहीं रंज का मक़ाम
बाद-ए-सफ़र वतन में हम आएँगे शाद-काम
होते हैं बात करने में चौदह बरस तमाम
क़ाएम उमीद ही से है दुनिया है जिस का नाम
और यूँ कहीं भी रंज-ओ-बला से मफ़र नहीं
क्या होगा दो घड़ी में किसी को ख़बर नहीं
अक्सर रियाज़ करते हैं फूलों पे बाग़बाँ
है दिन की धूप रात की शबनम उन्हें गिराँ
लेकिन जो रंग बाग़ बदलता है ना-गहाँ
वो गुल हज़ार पर्दों में जाते हैं राएगाँ
रखते हैं जो अज़ीज़ उन्हें अपनी जाँ की तरह
मिलते हैं दस्त-ए-यास वो बर्ग-ए-ख़िज़ाँ की तरह
लेकिन जो फूल खिलते हैं सहरा में बे-शुमार
मौक़ूफ़ कुछ रियाज़ पे उन की नहीं बहार
देखो ये क़ुदरत-ए-चमन-आरा-ए-रोज़गार
वो अब्र-ओ-बाद ओ बर्फ़ में रहते हैं बरक़रार
होता है उन पे फ़ज़्ल जो रब्ब-ए-करीम का
मौज-ए-सुमूम बनती है झोंका नसीम का
अपनी निगाह है करम-ए-कारसाज़ पर
सहरा चमन बनेगा वो है मेहरबाँ अगर
जंगल हो या पहाड़ सफ़र हो कि हो हज़र
रहता नहीं वो हाल से बंदे के बे-ख़बर
उस का करम शरीक अगर है तो ग़म नहीं
दामान-ए-दश्त दामन-ए-मादर से कम नहीं
Read Fullदामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलाम
इज़हार-ए-बे-कसी से सितम होगा और भी
देखा हमें उदास तो ग़म होगा और भी
दिल को सँभालता हुआ आख़िर वो नौनिहाल
ख़ामोश माँ के पास गया सूरत-ए-ख़याल
देखा तो एक दर में है बैठी वो ख़स्ता-हाल
सकता सा हो गया है ये है शिद्दत-ए-मलाल
तन में लहू का नाम नहीं ज़र्द रंग है
गोया बशर नहीं कोई तस्वीर-ए-संग है
क्या जाने किस ख़याल में गुम थी वो बे-गुनाह
नूर-ए-नज़र ये दीदा-ए-हसरत से की निगाह
जुम्बिश हुई लबों को भरी एक सर्द आह
ली गोशा-हा-ए-चश्म से अश्कों ने रुख़ की राह
चेहरे का रंग हालत-ए-दिल खोलने लगा
हर मू-ए-तन ज़बाँ की तरह बोलने लगा
आख़िर असीर-ए-यास का क़ुफ़्ल-ए-दहन खुला
अफ़्साना-ए-शदाइद-ए-रंज-ओ-मेहन खुला
इक दफ़्तर-ए-मज़ालिम-ए-चर्ख़-ए-कुहन खुला
वा था दहान-ए-ज़ख़्म कि बाब-ए-सुख़न खुला
दर्द-ए-दिल-ए-ग़रीब जो सर्फ़-ए-बयाँ हुआ
ख़ून-ए-जिगर का रंग सुख़न से अयाँ हुआ
रो कर कहा ख़मोश खड़े क्यूँ हो मेरी जाँ
मैं जानती हूँ जिस लिए आए हो तुम यहाँ
सब की ख़ुशी यही है तो सहरा को हो रवाँ
लेकिन मैं अपने मुँह से न हरगिज़ कहूँगी हाँ
किस तरह बन में आँखों के तारे को भेज दूँ
जोगी बना के राज-दुलारे को भेज दूँ
दुनिया का हो गया है ये कैसा लहू सपीद
अंधा किए हुए है ज़र-ओ-माल की उमीद
अंजाम क्या हो कोई नहीं जानता ये भेद
सोचे बशर तो जिस्म हो लर्ज़ां मिसाल-ए-बीद
लिक्खी है क्या हयात-ए-अबद इन के वास्ते
फैला रहे हैं जाल ये किस दिन के वास्ते
लेती किसी फ़क़ीर के घर में अगर जनम
होते न मेरी जान को सामान ये बहम
डसता न साँप बन के मुझे शौकत-ओ-हशम
तुम मेरे लाल थे मुझे किस सल्तनत से कम
मैं ख़ुश हूँ फूँक दे कोई इस तख़्त-ओ-ताज को
तुम ही नहीं तो आग लगा दूँगी राज को
किन किन रियाज़तों से गुज़ारे हैं माह-ओ-साल
देखी तुम्हारी शक्ल जब ऐ मेरे नौनिहाल
पूरा हुआ जो ब्याह का अरमान था कमाल
आफ़त ये आई मुझ पे हुए जब सफ़ेद बाल
छटती हूँ उन से जोग लिया जिन के वास्ते
क्या सब किया था मैं ने इसी दिन के वास्ते
ऐसे भी ना-मुराद बहुत आएँगे नज़र
घर जिन के बे-चराग़ रहे आह उम्र भर
रहता मिरा भी नख़्ल-ए-तमन्ना जो बे-समर
ये जा-ए-सब्र थी कि दुआ में नहीं असर
लेकिन यहाँ तो बन के मुक़द्दर बिगड़ गया
फल फूल ला के बाग़-ए-तमन्ना उजड़ गया
सरज़द हुए थे मुझ से ख़ुदा जाने क्या गुनाह
मँझधार में जो यूँ मिरी कश्ती हुई तबाह
आती नज़र नहीं कोई अम्न-ओ-अमाँ की राह
अब याँ से कूच हो तो अदम में मिले पनाह
तक़्सीर मेरी ख़ालिक़-ए-आलम बहल करे
आसान मुझ ग़रीब की मुश्किल अजल करे
सुन कर ज़बाँ से माँ की ये फ़रियाद-ए-दर्द-ख़ेज़
उस ख़स्ता-जाँ के दिल पे चली ग़म की तेग़-ए-तेज़
आलम ये था क़रीब कि आँखें हों अश्क-रेज़
लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़
सोचा यही कि जान से बेकस गुज़र न जाए
नाशाद हम को देख के माँ और मर न जाए
फिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूर
मायूस क्यूँ हैं आप अलम का है क्यूँ वफ़ूर
सदमा ये शाक़ आलम-ए-पीरी में है ज़रूर
लेकिन न दिल से कीजिए सब्र-ओ-क़रार दूर
शायद ख़िज़ाँ से शक्ल अयाँ हो बहार की
कुछ मस्लहत इसी में हो परवरदिगार की
ये ज'अल ये फ़रेब ये साज़िश ये शोर-ओ-शर
होना जो है सब उस के बहाने हैं सर-ब-सर
अस्बाब-ए-ज़ाहिरी में न इन पर करो नज़र
क्या जाने क्या है पर्दा-ए-क़ुदरत में जल्वा-गर
ख़ास उस की मस्लहत कोई पहचानता नहीं
मंज़ूर क्या उसे है कोई जानता नहीं
राहत हो या कि रंज ख़ुशी हो कि इंतिशार
वाजिब हर एक रंग में है शुक्र-ए-किर्दगार
तुम ही नहीं हो कुश्ता-ए-नैरंग-ए-रोज़गार
मातम-कदे में दहर के लाखों हैं सोगवार
सख़्ती सही नहीं कि उठाई कड़ी नहीं
दुनिया में क्या किसी पे मुसीबत पड़ी नहीं
देखे हैं इस से बढ़ के ज़माने ने इंक़लाब
जिन से कि ब-गुनाहों की 'उम्रें हुईं ख़राब
सोज़-ए-दरूँ से क़ल्ब ओ जिगर हो गए कबाब
पीरी मिटी किसी की किसी का मिटा शबाब
कुछ बन नहीं पड़ा जो नसीबे बिगड़ गए
वो बिजलियाँ गिरीं कि भरे घर उजड़ गए
माँ बाप मुँह ही देखते थे जिन का हर घड़ी
क़ाएम थीं जिन के दम से उमीदें बड़ी बड़ी
दामन पे जिन के गर्द भी उड़ कर नहीं पड़ी
मारी न जिन को ख़्वाब में भी फूल की छड़ी
महरूम जब वो गुल हुए रंग-ए-हयात से
उन को जला के ख़ाक किया अपने हात से
कहते थे लोग देख के माँ बाप का मलाल
इन बे-कसों की जान का बचना है अब मुहाल
है किब्रिया की शान गुज़रते ही माह-ओ-साल
ख़ुद दिल से दर्द-ए-हिज्र का मिटता गया ख़याल
हाँ कुछ दिनों तो नौहा-ओ-मातम हुआ किया
आख़िर को रो के बैठ रहे और क्या किया
पड़ता है जिस ग़रीब पे रंज-ओ-मेहन का बार
करता है उस को सब्र अता आप किर्दगार
मायूस हो के होते हैं इंसाँ गुनाहगार
ये जानते नहीं वो है दाना-ए-रोज़गार
इंसान उस की राह में साबित-क़दम रहे
गर्दन वही है अम्र-ए-रज़ा में जो ख़म रहे
और आप को तो कुछ भी नहीं रंज का मक़ाम
बाद-ए-सफ़र वतन में हम आएँगे शाद-काम
होते हैं बात करने में चौदह बरस तमाम
क़ाएम उमीद ही से है दुनिया है जिस का नाम
और यूँ कहीं भी रंज-ओ-बला से मफ़र नहीं
क्या होगा दो घड़ी में किसी को ख़बर नहीं
अक्सर रियाज़ करते हैं फूलों पे बाग़बाँ
है दिन की धूप रात की शबनम उन्हें गिराँ
लेकिन जो रंग बाग़ बदलता है ना-गहाँ
वो गुल हज़ार पर्दों में जाते हैं राएगाँ
रखते हैं जो अज़ीज़ उन्हें अपनी जाँ की तरह
मिलते हैं दस्त-ए-यास वो बर्ग-ए-ख़िज़ाँ की तरह
लेकिन जो फूल खिलते हैं सहरा में बे-शुमार
मौक़ूफ़ कुछ रियाज़ पे उन की नहीं बहार
देखो ये क़ुदरत-ए-चमन-आरा-ए-रोज़गार
वो अब्र-ओ-बाद ओ बर्फ़ में रहते हैं बरक़रार
होता है उन पे फ़ज़्ल जो रब्ब-ए-करीम का
मौज-ए-सुमूम बनती है झोंका नसीम का
अपनी निगाह है करम-ए-कारसाज़ पर
सहरा चमन बनेगा वो है मेहरबाँ अगर
जंगल हो या पहाड़ सफ़र हो कि हो हज़र
रहता नहीं वो हाल से बंदे के बे-ख़बर
उस का करम शरीक अगर है तो ग़म नहीं
दामान-ए-दश्त दामन-ए-मादर से कम नहीं
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लिखा ये दावर-ए-महशर ने मेरी फ़र्द-ए-इसयाँ पर
ये वो बंदा है जिस पर नाज़ करता है करम मेरा
कहा ग़ुंचा ने हँस कर वाह क्या नैरंग-ए-आलम है
वजूद गुल जिसे समझे हैं सब है वो अदम मेरा
कशाकश है उम्मीद-ओ-यास की ये ज़िंदगी क्या है
इलाही ऐसी हस्ती से तो अच्छा था अदम मेरा
दिल-ए-अहबाब में घर है शगुफ़्ता रहती है ख़ातिर
यही जन्नत है मेरी और यही बाग़-ए-इरम मेरा
मुझे अहबाब की पुर्सिश की ग़ैरत मार डालेगी
क़यामत है अगर इफ़शा हुआ राज़-ए-अलम मेरा
खड़ी थीं रास्ता रोके हुए लाखों तमन्नाएँ
शहीद-ए-यास हूँ निकला है किस मुश्किल से दम मेरा
ख़ुदा ने इल्म बख़्शा है अदब अहबाब करते हैं
यही दौलत है मेरी और यही जाह-ओ-हशम मेरा
ज़बान-ए-हाल से ये लखनऊ की ख़ाक कहती है
मिटाया गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने जाह-ओ-हशम मेरा
किया है फ़ाश पर्दा कुफ़्र-ओ-दीं का इस क़दर मैं ने
कि दुश्मन है बरहमन और अदू शैख़-ए-हरम मेरा
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अज़ीज़ान-ए-वतन को ग़ुंचा ओ बर्ग ओ समर जाना
ख़ुदा को बाग़बाँ और क़ौम को हम ने शजर जाना
उरूस-ए-जाँ नया पैराहन-ए-हस्ती बदलती है
फ़क़त तम्हीद आने की है दुनिया से गुज़र जाना
मुसीबत में बशर के जौहर-ए-मर्दाना खुलते हैं
मुबारक बुज़दिलों को गर्दिश-ए-क़िस्मत से डर जाना
वो तब्-ए-यास-परवर ने मुझे चश्म-ए-अक़ीदत दी
कि शाम-ए-ग़म की तारीकी को भी नूर-ए-सहर जाना
बहुत सौदा रहा वाइज़ तुझे नार-ए-जहन्नम का
मज़ा सोज़-ए-मोहब्बत का भी कुछ ऐ बे-ख़बर जाना
करिश्मा ये भी है ऐ बे-ख़बर इफ़्लास-ए-क़ौमी का
तलाश-ए-रिज़्क़ में अहल-ए-हुनर का दर-ब-दर जाना
अजल की नींद में भी ख़्वाब-ए-हस्ती गर नज़र आया
तो फिर बेकार है तंग आ के इस दुनिया से मर जाना
वो सौदा ज़िंदगी का है कि ग़म इंसान सहता है
नहीं तो है बहुत आसान इस जीने से मर जाना
चमन-ज़ार-ए-मोहब्ब्बत में उसी ने बाग़बानी की
कि जिस ने अपनी मेहनत को ही मेहनत का समर जाना
सिधारी मंज़िल-ए-हस्ती से कुछ बे-ए'तिनाई से
तन-ए-ख़ाकी को शायद रूह ने गर्द-ए-सफ़र जाना
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हम सोचते हैं रात में तारों को देख कर
शमएँ ज़मीन की हैं जो दाग़ आसमाँ के हैं
शमएँ ज़मीन की हैं जो दाग़ आसमाँ के हैं
जन्नत में ख़ाक बादा-परस्तों का दिल लगे
नक़्शे नज़र में सोहबत पीर-ए-मुग़ाँ के हैं
अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा है बाग़ में
गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं
इक सिलसिला हवस का है इंसाँ की ज़िंदगी
इस एक मुश्त-ए-ख़ाक को ग़म दो-जहाँ के हैं
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बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा में परा होता
जिधर उठती नज़र कोसों तलक जंगल हरा होता
मय-ए-गुल-रंग लुटती यूँ दर-ए-मय-ख़ाना वा होता
न पीने की कमी होती न साक़ी से गिला होता
हज़ारों जान देते हैं बुतों की बे-वफ़ाई पर
अगर उन में से कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता
रुलाया अहल-ए-महफ़िल को निगाह-ए-यास ने मेरी
क़यामत थी जो इक क़तरा इन आँखों से जुदा होता
ख़ुदा को भूल कर इंसान के दिल का ये आलम है
ये आईना अगर सूरत-नुमा होता तो क्या होता
अगर दम भर भी मिट जाती ख़लिश ख़ार-ए-तमन्ना की
दिल-ए-हसरत-तलब को अपनी हस्ती से गिला होता
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गुनह-गारों में शामिल हैं गुनाहों से नहीं वाक़िफ़
सज़ा को जानते हैं हम ख़ुदा जाने ख़ता क्या है
ये रंग-ए-बे-कसी रंग-ए-जुनूँ बन जाएगा ग़ाफ़िल
समझ ले यास-ओ-हिरमाँ के मरज़ की इंतिहा क्या है
नया बिस्मिल हूँ मैं वाक़िफ़ नहीं रस्म-ए-शहादत से
बता दे तू ही ऐ ज़ालिम तड़पने की अदा क्या है
चमकता है शहीदों का लहू पर्दे में क़ुदरत के
शफ़क़ का हुस्न क्या है शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना क्या है
उमीदें मिल गईं मिट्टी में दौर-ए-ज़ब्त-ए-आख़िर है
सदा-ए-ग़ैब बतला दे हमें हुक्म-ए-ख़ुदा क्या है
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