मंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहते
दो चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते
दो चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते
इक हम हैं कि ग़ैरों को भी कह देते हैं अपना
इक तुम हो कि अपनों को भी अपना नहीं कहते
कम-हिम्मती ख़तरा है समुंदर के सफ़र में
तूफ़ान को हम दोस्तो ख़तरा नहीं कहते
बन जाए अगर बात तो सब कहते हैं क्या क्या
और बात बिगड़ जाए तो क्या क्या नहीं कहते
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सफ़र में मुश्किलें आएँ तो जुरअत और बढ़ती है
कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढ़ती है
कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढ़ती है
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सच बोलने के तौर-तरीक़े नहीं रहे
पत्थर बहुत हैं शहर में शीशे नहीं रहे
पत्थर बहुत हैं शहर में शीशे नहीं रहे
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ख़ुद को कितना छोटा करना पड़ता है
बेटे से समझौता करना पड़ता है
बेटे से समझौता करना पड़ता है
जब औलादें नालायक़ हो जाती हैं
अपने ऊपर ग़ुस्सा करना पड़ता है
सच्चाई को अपनाना आसान नहीं
दुनिया भर से झगड़ा करना पड़ता है
जब सारे के सारे ही बे-पर्दा हों
ऐसे में खु़द पर्दा करना पड़ता है
प्यासों की बस्ती में शो'ले भड़का कर
फिर पानी को महंगा करना पड़ता है
हँस कर अपने चहरे की हर सिलवट पर
शीशे को शर्मिंदा करना पड़ता है
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हाल-ए-दिल सब से छुपाने में मज़ा आता है
आप पूछें तो बताने में मज़ा आता है
आप पूछें तो बताने में मज़ा आता है
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