Aisha Ayyub

Top 10 of Aisha Ayyub

    तुम्हारे हिज्र की मुद्दत घटा रही हूँ मैं
    घड़ी में वक़्त को उल्टा घुमा रही हूँ मैं

    किताब-ए-ज़िंदगी मैं ने अगर पढ़ी ही नहीं
    क्यूँ इम्तिहान का परचा बना रही हूँ मैं

    लगाई मैं ने किनारे पर आँसुओं की सबील
    नदी की प्यास को पानी पिला रही हूँ मैं

    यही कि दिल की सुनी है दिमाग़ से पहले
    सज़ा उसी की मोहब्बत में पा रही हूँ मैं

    सुना है और ज़ियादा सितम करेगा तू
    सो अपने ज़ब्त की ताक़त बढ़ा रही हूँ मैं

    लगा के एक अलग ज़ख़्म उस के पहलू में
    तुम्हारे ज़ख़्म को नीचा दिखा रही हूँ मैं
    Read Full
    Aisha Ayyub
    9
    1 Like
    मुस्कुराने को मुसव्विर ने कहा
    मैं ने कोशिश की नहीं मुझ से हुआ

    रेज़ा रेज़ा कर दिया तुम ने मुझे
    मेरे मलबे में बताओ क्या मिला

    लफ़्ज़ चेहरे पर नुमू होने लगे
    मेरी चुप ने काम अपना कर दिया

    तेरी ख़ुशबू हर तरफ़ महसूस की
    एक ऐसा फूल फ़ुर्क़त में खिला

    देखना है आज तुझ को ग़ौर से
    हट ज़रा पीछे ज़रा सा दूर जा

    वो रहा ख़ामोश मेरी बात पर
    काम उस ने साफ़-गोई से लिया

    ख़ूब-सूरत मोड़ पर बिछ्ड़ें गे हम
    फ़ैसला दोनों ने मिल कर ये किया
    Read Full
    Aisha Ayyub
    8
    1 Like
    उजलत में वो देखो क्या क्या छोड़ गया
    अपनी बातें अपना चेहरा छोड़ गया

    मुझ से एक कहानी सुनने आया था
    और मुझ में वो अपना क़िस्सा छोड़ गया

    ख़्वाब-ज़दा था बातें करता रहता था
    रोने वालों को भी हँसता छोड़ गया

    दिल के इक कोने में आहें रक्खी हैं
    जाने वाला अपना हिस्सा छोड़ गया

    जितनी यादें ले के हम को मरना था
    उतनी साँसें दे के ज़िंदा छोड़ गया

    दीवारों से लग के रो लेते होंगे
    जिन को उन का साया तन्हा छोड़ गया

    कमरे से जिस दिन उस की तस्वीर हटी
    आईने ने देख के पूछा छोड़ गया
    Read Full
    Aisha Ayyub
    7
    2 Likes
    ख़त्म तेरी याद का हर सिलसिला कैसे करूँ
    दूर रह कर मैं तुझे ख़ुद से जुदा कैसे करूँ

    पर समेटे ख़ुद ही बैठा है परिंदा इक तरफ़
    जो क़फ़स में ही नहीं उस को रिहा कैसे करूँ

    देखना और देख कर बस देखते रहना तुझे
    इस तसलसुल की बता मैं इंतिहा कैसे करूँ

    मुस्तक़िल दीवार से मैं ने लगा रक्खे हैं कान
    इस में चुनवाई गई चुप को सदा कैसे करूँ

    देखती रहती हूँ इन को सोचती रहती हूँ ये
    तेरी आँखों की ज़बाँ का तर्जुमा कैसे करूँ

    जा रहा है जाए वो मैं किस लिए रोकूँ उसे
    ऐ मिरे दिल बे-वफ़ा को बा-वफ़ा कैसे करूँ

    ऐन मुमकिन है कि मुझ को ख़ुद-कुशी करनी पड़े
    वर्ना इतने सानेहों का हक़ अदा कैसे करूँ

    आज़माइश की ज़रूरत हो न जिस में 'आइशा' इश्क़ में उस मरहले की इब्तिदा कैसे करूँ
    Read Full
    Aisha Ayyub
    6
    1 Like
    दिन गुज़रा और शाम ढली फिर वहशत ले कर आई रात
    जब भी उस का हिज्र मनाया हम ने वो कहलाई रात

    उस को रोने से पहले कुछ हम ने यूँ तय्यारी की
    कोने में तन्हाई रक्खी कमरे में फैलाई रात

    तू ने कैसे सोच लिया कि तेरे तोहफ़े भूल गए
    दिल ने तेरे ग़म को पहना आँखों को पहनाई रात

    सावन आया लेकिन सूखी एहसासों की हरियाली
    बंजर दिल में आँसू बोए ऊपर से बरसाई रात

    कोई भी मौसम आया हो हम पर तो बरसात हुई
    उस की यादों ने जो घेरा दोपहरों पर छाई रात

    उस पल जैसे बोल पड़ा हो दीवारों का सन्नाटा
    उस की राहें तकते तकते जैसे हो उकताई रात

    कितने ही मंज़र शामिल हैं मेरी सूनी आँखों में
    चुप के से आ के करती है पलकों की तुरपाई रात

    चाहत की ये रेशमी गिर्हें और पलकों पर नींद का बोझ
    यादों से जो बच निकले तो ख़्वाबों ने उलझाई रात
    Read Full
    Aisha Ayyub
    5
    2 Likes
    ये बन-सँवर के मिरी सादगी में लौट आए
    मिरे ख़याल मिरी शाइ'री में लौट आए

    उसे कहो कि मिरी ज़ात अब भी बाक़ी है
    दिया बुझा दे मिरी रौशनी में लौट आए

    वो जिस तरह से परिंदे शजर पे लौटते हैं
    हम अपने आप से निकले तुझी में लौट आए

    जो मैं हँसूँ तो मिरा अश्क बन के वो छलके
    किसी तरह से वो मेरी हँसी में लौट आए

    ख़ुशी मिली भी तो हम को कभी न रास आई
    उदासियों के सबब इस ख़ुशी में लौट आए

    फिसलती रेत सा हाथों से गिर गया था जो
    वो गुज़रा वक़्त कभी फिर घड़ी में लौट आए

    हमें तो एक ही चेहरे का काम होता है
    हटा के भीड़ को हम फिर उसी में लौट आए

    बड़े ग़ुरूर से निकले थे अलविदा'अ कह कर
    बस एक बार पुकारा गली में लौट आए
    Read Full
    Aisha Ayyub
    4
    2 Likes
    यूँ भी रास आई नहीं उस की वफ़ा तुम रख लो
    मुझ को बीमार ही रहने दो दवा तुम रख लो

    बंद कमरों की घुटन मेरे लिए रहने दो
    ये जो आती है दरीचों से हवा तुम रख लो

    मेरी राहों में बिछा दो तुम अँधेरे सारे
    और ये लो मिरे हिस्से का दिया तुम रख लो

    ओढ़ कर बैठ गई हूँ मैं दुखों की चादर
    ये ख़ुशी और ये ख़ुशबू-ए-क़बा तुम रख लो

    मुझ को ये नूर-ए-क़मर तीरगी से हासिल है
    मेरे अंदर से जो निकली है ज़िया तुम रख लो

    पास बैठे कोई दिल खोल के दो बात करे
    बाक़ी दुनिया के ये अतवार-ओ-अदा तुम रख लो

    मेरी माँ तो मिरी जन्नत को लिए बैठी है
    ऐसा कर लो मिरे पुरखों की दुआ तुम रख लो

    मैं गुनहगार ही अच्छी हूँ बरा-ए-महफ़िल
    ये जो तुम बेचते फिरते हो ख़ुदा तुम रख लो
    Read Full
    Aisha Ayyub
    3
    2 Likes
    कुछ बात रह गई थी बताने के बावजूद
    हूँ हालत-ए-सफ़र में घर आने के बावजूद

    दिल से उतर चुका था जो आ कर गले मिला
    दूरी वही थी दिल से लगाने के बावजूद

    हाथों में अब भी उस की है ख़ुशबू बसी हुई
    जो रह गई थी हाथ छुड़ाने के बावजूद

    पुर्ज़े वो ख़त के आज भी रक्खे हैं मेरे पास
    जो बच गए थे ख़त को जलाने के बावजूद

    नाम उस का मेरे दिल पे छपा इस तरह से है
    यूँ नक़्श है अभी भी मिटाने के बावजूद

    मुझ को भी ये कमाल-ए-हुनर है मिला हुआ
    मैं जी रही हूँ उस को भुलाने के बावजूद

    कोई भी हम-शनास नहीं हम-नवा नहीं
    रिश्तों में इक ख़ला है निभाने के बावजूद

    तेरी सदाएँ आईं जो माज़ी की सम्त से
    हम रुक गए हैं पाँव बढ़ाने के बावजूद

    जो ज़िद में बढ़ गए थे ज़मीनों को रौंद कर
    ख़ुश क्यूँ नहीं हैं आसमाँ पाने के बावजूद

    ये कैसा इंतिज़ार कि होता नहीं है ख़त्म
    तू आ गया मगर तिरे आने के बावजूद
    Read Full
    Aisha Ayyub
    2
    2 Likes
    तुम से आता नहीं जुदा होना
    तुम मिरी आख़िरी सज़ा होना

    जिस को तुम रोज़ दिख ही जाते हो
    उस की क़िस्मत है आइना होना

    उस के होने की ये गवाही है
    इन दरख़्तों का यूँ हरा होना

    कितना मुश्किल है बचपना अब तो
    कितना आसान था बड़ा होना

    मैं तो हल हूँ किसी की मुश्किल का
    मुझ को आया न मसअला होना
    Read Full
    Aisha Ayyub
    1
    2 Likes