khatm teri yaad ka har silsila kaise karoon | ख़त्म तेरी याद का हर सिलसिला कैसे करूँँ

  - Aisha Ayyub

ख़त्म तेरी याद का हर सिलसिला कैसे करूँँ
दूर रह कर मैं तुझे ख़ुद से जुदा कैसे करूँँ

पर समेटे ख़ुद ही बैठा है परिंदा इक तरफ़
जो क़फ़स में ही नहीं उस को रिहा कैसे करूँँ

देखना और देख कर बस देखते रहना तुझे
इस तसलसुल की बता मैं इंतिहा कैसे करूँँ

मुस्तक़िल दीवार से मैं ने लगा रक्खे हैं कान
इस में चुनवाई गई चुप को सदा कैसे करूँँ

देखती रहती हूँ इन को सोचती रहती हूँ ये
तेरी आँखों की ज़बाँ का तर्जुमा कैसे करूँँ

जा रहा है जाए वो मैं किस लिए रोकूँ उसे
ऐ मिरे दिल बेवफ़ा को बा-वफ़ा कैसे करूँँ

ऐन मुमकिन है कि मुझ को ख़ुद-कुशी करनी पड़े
वर्ना इतने सानेहों का हक़ अदा कैसे करूँँ

आज़माइश की ज़रूरत हो न जिस में 'आइशा' 'इश्क़ में उस मरहले की इब्तिदा कैसे करूँँ

  - Aisha Ayyub

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