din guzra aur shaam dhali phir vehshat le kar aayi raat | दिन गुज़रा और शाम ढली फिर वहशत ले कर आई रात

  - Aisha Ayyub

दिन गुज़रा और शाम ढली फिर वहशत ले कर आई रात
जब भी उस का हिज्र मनाया हम ने वो कहलाई रात

उस को रोने से पहले कुछ हम ने यूँँ तय्यारी की
कोने में तन्हाई रक्खी कमरे में फैलाई रात

तू ने कैसे सोच लिया कि तेरे तोहफ़े भूल गए
दिल ने तेरे ग़म को पहना आँखों को पहनाई रात

सावन आया लेकिन सूखी एहसासों की हरियाली
बंजर दिल में आँसू बोए ऊपर से बरसाई रात

कोई भी मौसम आया हो हम पर तो बरसात हुई
उस की यादों ने जो घेरा दोपहरों पर छाई रात

उस पल जैसे बोल पड़ा हो दीवारों का सन्नाटा
उस की राहें तकते तकते जैसे हो उकताई रात

कितने ही मंज़र शामिल हैं मेरी सूनी आँखों में
चुप के से आ के करती है पलकों की तुरपाई रात

चाहत की ये रेशमी गिर्हें और पलकों पर नींद का बोझ
यादों से जो बच निकले तो ख़्वाबों ने उलझाई रात

  - Aisha Ayyub

Judai Shayari

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