Aleem Akhtar

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@aleem-akhtar

Aleem Akhtar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Aleem Akhtar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ये और बात कि इक़रार कर सकें न कभी मिरी वफ़ा का मगर उन को ए'तिबार तो है — Aleem Akhtar

Ghazal

दिल को शाइस्ता-ए-एहसास-ए-तमन्ना न करें आप इस अंदाज़-ए-नज़र से मुझे देखा न करें यक-ब-यक लुत्फ़ ओ इनायत का इरादा न करें आप यूँँ अपनी जफ़ाओं को तमाशा न करें उन को ये फ़िक्र है अब तर्क-ए-त'अल्लुक़ कर के कि हम अब पुर्सिश-ए-अहवाल करें या न करें हाँ मिरे हाल पे हँसते हैं ज़माने वाले आप तो वाक़िफ़-ए-हालात हैं ऐसा न करें उन की दुज़-दीदा-निगाही का तक़ाज़ा है कि अब हम किसी और को क्या ख़ुद को भी देखा न करें वो तअल्लुक़ है तिरे ग़म से कि अल्लाह अल्लाह हम को हासिल हो ख़ुशी भी तो गवारा न करें इस में पोशीदा है पिंदार-ए-मोहब्बत की शिकस्त आप मुझ से भी मिरे हाल को पूछा न करें न रहा तेरी मोहब्बत से तअल्लुक़ न सही निस्बत-ए-ग़म से भी क्या ख़ुद को पुकारा न करें मैं कि ख़ुद अपनी वफ़ाओं पे ख़जिल हूँ 'अख़्तर' वो तो लेकिन सितम ओ जौर से तौबा न करें — Aleem Akhtar
मोहब्बत का रग-ओ-पै में मिरी रूह-ए-रवाँ होना मुबारक हर नफ़स को इक हयात-ए-जावेदाँ होना हमारे दिल को आए किस तरह फिर शादमाँ होना तिरी नज़रों ने सीखा ही नहीं जब मेहरबाँ होना तिरे कूचे में होना उस पे तेरा आस्ताँ होना मुबारक तेरे कूचे की ज़मीं को आसमाँ होना ये हालत है कि बेदारी भी है इक ख़्वाब का आलम मआज़-अल्लाह अपना ख़ूगर-ए-ख़्वाब-ए-गिराँ होना उसे ख़ुश कर सकेंगी क्या बहारें ज़िंदगानी की चमन में जिस ने देखा हो बहारों का ख़िज़ाँ होना जो बद-क़िस्मत तिरे ग़म की मसर्रत से हैं ना-वाक़िफ़ वो क्या जानें किसे कहते हैं दिल का शादमाँ होना मुझे आँखें दिखाएगी भला क्या गर्दिश-ए-दौराँ मिरी नज़रों ने देखा है तिरा ना-मेहरबाँ होना जबीं ओ आस्ताँ के दरमियाँ सज्दे हों क्यूँँ हाइल जबीं को हो मुयस्सर काश जज़्ब-ए-आस्ताँ होना हवस-कारान-ए-इशरत आह क्या समझेंगे ऐ 'अख़्तर' बहुत दुश्वार है ज़ौक़-ए-अलम का राज़-दाँ होना — Aleem Akhtar
किसी के वादा-ए-फ़र्दा पर ए'तिबार तो है तुलू-ए-सुब्ह-ए-क़यामत का इंतिज़ार तो है मिरी जगह न रही तेरी बज़्म में लेकिन तिरी ज़बाँ पे मिरा ज़िक्र-ए-नागवार तो है मता-ए-दर्द को दिल से अज़ीज़ रखता हूँ कि ये किसी की मोहब्बत की यादगार तो है ये और बात कि इक़रार कर सकें न कभी मिरी वफ़ा का मगर उन को ए'तिबार तो है मक़ाम-ए-दिल कोई मंज़िल न बन सका न सही तिरी निगाह-ए-मोहब्बत की रहगुज़ार तो है वो ज़ौक़-ए-दीद न शौक़-ए-नज़ारा अब लेकिन मिरी नज़र को अभी उन का इंतिज़ार तो है अगर निगाह-ए-करम शेवा अब नहीं न सही मिरी तरफ़ अभी चश्म-ए-सितम-शिआर तो है ये और बात नसीब-ए-नज़र नहीं लेकिन नफ़स नफ़स तिरे जल्वों से हम-कनार तो है ज़माना साथ नहीं दे रहा तो क्या 'अख़्तर' अभी जिलौ में मिरे बख़्त-ए-साज़गार तो है — Aleem Akhtar
मोहब्बत क्या मोहब्बत का सिला क्या ग़म-ए-बर्बादी-ए-जिंस-ए-वफ़ा क्या दिल-ए-बे-मुद्दआ का मुद्दआ' क्या हमारा हाल हम से पूछना क्या हमें दुनिया में अपने ग़म से मतलब ज़माने की ख़ुशी से वास्ता क्या सितम-हा-ए-फ़रावाँ चाहता हूँ करम की आरज़ू क्या इल्तिजा क्या हम उस के और उस का ग़म हमारा इस अंदाज़-ए-करम का पूछना क्या रहा दिल को न अब ज़ौक़-ए-सितम क्यूँँ वो हैं आमादा-ए-तर्क-ए-जफ़ा क्या तिरे ग़म के सहारे जी रहे हैं हमारी आरज़ू क्या मुद्दआ' क्या बहारों पर ख़िज़ाँ सर्फ़-ए-असर है मआल-ए-ग़ुंचा-ओ-गुल देखना क्या तअल्लुक़ और तिरे ग़म से तअल्लुक़ उरूज-ए-बख़्त-ए-'अख़्तर' पूछना क्या — Aleem Akhtar
वो क्या गए पयाम-ए-सफ़र दे गए मुझे इक जज़्बा-ए-जुनून-ए-असर दे गए मुझे हर सम्त देखती है जो उन के जमाल को वो इक निगाह-ए-जल्वा-नगर दे गए मुझे हर-चंद कर्ब-ए-मर्ग है महसूस हर नफ़स लुत्फ़-ए-हयात-ए-इश्क़ मगर दे गए मुझे तस्वीर-ए-हुज़्न-ओ-यास बना कर चले गए लब-हा-ए-ख़ुश्क ओ दीदा-ए-तर दे गए मुझे बेदार कर गए सहर-ओ-शाम-ए-ज़िंदगी आह-ओ-फ़ुग़ान-ए-शाम-ओ-सहर दे गए मुझे जमती नहीं निगाह किसी चीज़ पर भी अब इक ख़ीरगी-ए-ताब-ए-नज़र दे गए मुझे अर्ज़-ए-हदीस-ए-शौक़ पे शरमा के रह गए कितना हसीं जवाब मगर दे गए मुझे मेरे सुकून-ए-क़ल्ब को ले कर चले गए और इज़्तिराब-ए-दर्द-ए-जिगर दे गए मुझे महरूम-ए-शश-जहात निगाहों को कर गए बस इक निगाह-ए-जानिब-ए-दर दे गए मुझे 'अख़्तर' वो आए और चले भी गए मगर इक लुत्फ़-ए-इज़्तिराब-ए-असर दे गए मुझे — Aleem Akhtar