थोड़े से मसाइल में गिरफ़्तार हैं हम लोग
दुनिया को ये लगता है गुनहगार हैं हम लोग
दुनिया को ये लगता है गुनहगार हैं हम लोग
आब-ओ-हवा-ए-शहर ने नासाज़ किया यूँ
जैसे कि कई साल से बीमार हैं हम लोग
मुद्दत से यही पूछ रहा हूँ मैं मुसलसल
ये किस की बदौलत है जो मिसमार हैं हम लोग
बँटवारा ये कहता है कि हम एक नहीं हैं
तारीख़ ये कहती है कि हमवार हैं हम लोग
गर सच नहीं मालूम तो इतिहास को पढ़ लो
वरना यही समझोगे कि ग़द्दार हैं हम लोग
ऐ हिंद तुझे जब भी ज़रूरत हो बताना
जान अपनी लुटाने को भी तय्यार हैं हम लोग
आँखों से तो अब आँसू मुसल्लों पे गिरे हैं
या रब बता क्या अब भी गुनहगार हैं हम लोग
हम ये भी नहीं कहते कि घर बार लुटा दो
पर थोड़ी मोहब्बत के तो हक़दार हैं हम लोग
हस्साम मुनाफ़िक़ से कहो होश में आए
अब उस के रवय्ये से ख़बरदार हैं हम लोग
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पुरानी इक कहानी लिख रहा हूँ
कहाँ गुज़री जवानी लिख रहा हूँ
कहाँ गुज़री जवानी लिख रहा हूँ
मेरे अश'आर में कुछ भी न मेरा
मैं बस उस की निशानी लिख रहा हूँ
बहुत गंदे चलन उस के हैं फिर भी
मैं उस को ख़ानदानी लिख रहा हूँ
हुआ क्या है मुझे कोई बताए
मैं क्यूँ पानी से पानी लिख रहा हूँ
वो जिस के इश्क़ ने शाइ'र बनाया
उसी की मेहरबानी लिख रहा हूँ
मेरी तक़दीर में शायद नहीं है
मैं जिस को दिल की रानी लिख रहा हूँ
मोहब्बत कर के देखा है तभी तो
मोहब्बत को मैं फ़ानी लिख रहा हूँ
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जो है मेरे दिल में छुपाना नहीं है
मगर साफ़ तुम को बताना नहीं है
मगर साफ़ तुम को बताना नहीं है
मुझे अलविदा कहने आए ही क्यूँ हो
गले से मुझे जब लगाना नहीं है
हमारा पता जान कर क्या करोगे
तुम्हें लौट कर अब जब आना नहीं है
मुझे बेचकर ग़म कमानी है दौलत
मेरे पास कोई ख़ज़ाना नहीं है
लगाओ न उम्मीद मुझ से ज़ियादा
मेरा कोई ख़ुद का ठिकाना नहीं है
पड़े रहने दो मुझ को उजड़े चमन में
मुझे अपने घर को बसाना नहीं है
ख़ता दिल ने की है तो दिल अपना भुगते
हमें फेफड़ों को जलाना नहीं है
गले लग के क्यूँ रो रहे हो मुसलसल
जो 'हस्साम' को कुछ बताना नहीं है
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उतरी उतरी अपनी सूरत देखोगे
जिस दिन हम जैसों की हिम्मत देखोगे
जिस दिन हम जैसों की हिम्मत देखोगे
मेरे लिए खोदोगे कुएँ तो गिरोगे ख़ुद
और उसी दिन मेरी क़िस्मत देखोगे
गर पहली उम्मीद ख़ुदा से होगी तो
वक़्त-ए-आफ़त रब की क़ुदरत देखोगे
जब सीखोगे लोगों की इज़्ज़त करना
तब लोगों में अपनी इज़्ज़त देखोगे
जिस दिन ख़ालिक़ देगा तुम को इक बेटी
उस दिन से फिर घर में बरकत देखोगे
वक़्त मैं ऐसा लाऊँगा तुम मेरे लिए
दुश्मन के भी दिल में मोहब्बत देखोगे
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बड़ी मुश्किल से मिलता है यहाँ पर एक भी क़तरा
ख़ुदा गर साथ हो तो फिर समुंदर चल के आता है
ख़ुदा गर साथ हो तो फिर समुंदर चल के आता है
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दरिया भी नहीं थे तिरे साहिल भी नहीं थे
हम कश्ती डुबाने में तो शामिल भी नहीं थे
हम कश्ती डुबाने में तो शामिल भी नहीं थे
वो लोग जो सालों से सज़ा काट रहे हैं
वो क़ातिलों की भीड़ में शामिल भी नहीं थे
हम जिन की मुहब्बत में भुला बैठे हैं ख़ुद को
वो कहते हैं हम प्यार के क़ाबिल भी नहीं थे
जो शख़्स मिरे दिल से निकाले नहीं निकला
उस शख़्स के हम दिल में तो दाख़िल भी नहीं थे
ता'बीर की ख़्वाहिश में भटकते रहे लेकिन
रस्ता भी नहीं थे तेरी मंज़िल भी नहीं थे
वो लोग जिन्हें अपना समझते रहे अब तक
वो लोग भरोसे के तो क़ाबिल भी नहीं थे
तुम जिन के बिछड़ जाने पे सद
में में गए हो
'हस्साम' तुम्हें लोग वो हासिल भी नहीं थे
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हमें रब से मिला वो भी जो क़िस्मत में नहीं था
न जाने क्यूँ ख़ुदा से हम मुहब्बत माँगते हैं
न जाने क्यूँ ख़ुदा से हम मुहब्बत माँगते हैं
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नुक़्सान नफ़ा कुछ नहीं पर बाँट रहे हो
तुम बाप के जीते-जी ये घर बाँट रहे हो
तुम बाप के जीते-जी ये घर बाँट रहे हो
ये लाश मिरी देख के अंजान बने हैं
इन लोगों को तुम कैसी नज़र बाँट रहे हो
तुम भी तो बहुत करते थे कल अम्न की बातें
कुर्सी के लिए आज बशर बाँट रहे हो
ख़ुद आप के बच्चे तो विदेशों में हैं पढ़ते
पर हम को तो दंगों का हुनर बाँट रहे हो
'हस्साम' तुम्हें ख़ुशियों से है दुश्मनी शायद
जो ले के हथेली पे जिगर बाँट रहे हो
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उधर देखो वो तन्हा आ रहा है
इधर तुम को पसीना आ रहा है
इधर तुम को पसीना आ रहा है
मिरे शे'रों रखो तलवार नीचे
वो देखो वो निहत्था आ रहा है
वो जिस ने छीन कर मारा था कासा
वही ले कर के कासा आ रहा है
मुझी से की है उस लड़की ने शादी
मुझे कैसा ये सपना आ रहा है
जो इक ग़लती हुई है बस उसी पे
हमें हर रोज़ रोना आ रहा है
तो अब चलता हूँ मैं बहर-ए-फ़ना में
मिरी जानिब फ़रिश्ता आ रहा है
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