Hassam Tajub

Hassam Tajub

@hassamtajub

Hassam Tajub shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Hassam Tajub's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

4

Content

19

Likes

42

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

Sher

बड़ी मुश्किल से मिलता है यहाँ पर एक भी क़तरा ख़ुदा गर साथ हो तो फिर समुंदर चल के आता है — Hassam Tajub
हमें रब से मिला वो भी जो क़िस्मत में नहीं था न जाने क्यूँ ख़ुदा से हम मुहब्बत माँगते हैं — Hassam Tajub

Ghazal

जब बिछड़ना तय हुआ है तुम समझते क्यूँ नहीं वक़्त का ये फ़ैसला है तुम समझते क्यूँ नहीं आज भी उम्मीद पाले फिर रहे हो दर-ब-दर जाने वाला जा चुका है तुम समझते क्यूँ नहीं नफ़रतों वाली सियासत कब तलक ऐ रहबरों मुल्क पीछे जा रहा है तुम समझते क्यूँ नहीं अब तो दरिया के तजावुज़ को ख़ुदाया रोक दो घर हमारा जा रहा है तुम समझते क्यूँ नहीं बाज़ आ जाओ सँभालो घर की ज़िम्मेदारियाँ बाप बूढ़ा हो चुका है तुम समझते क्यूँ नहीं जल्द आ जाओ वगरना हम जुदा हो जाएँगे आख़िरी फेरा बचा है तुम समझते क्यूँ नहीं हर किसी की बंदगी 'हस्साम' ये तो शिर्क है अपना मालिक बस ख़ुदा है तुम समझते क्यूँ नहीं — Hassam Tajub
जो जाता है वो फिर वापस निभाने को नहीं आता कोई वीरानियों में घर बसाने को नहीं आता तुझे गर चाहिए इज़्ज़त तो ख़ुद किरदार बेहतर कर किसी की शख़्सियत कोई बनाने को नहीं आता हमारे अस्पतालों पर बरसते बम हैं पर कोई हमारी मौत का मातम मनाने को नहीं आता कभी भूखा न सोया मैं थी जब तक माँ मेरी ज़िंदा जो अब रूठूँ तो कोई भी मनाने को नहीं आता ख़ुदा तू ज़िंदगी भर रख सलामत मेरे वालिद को सिवा उन के कोई हिम्मत बढ़ाने को नहीं आता अगर 'हस्साम' उस ने दिल न तोड़ा होता तो फिर मैं कभी भी महफ़िलों में दर्द गाने को नहीं आता — Hassam Tajub
थोड़े से मसाइल में गिरफ़्तार हैं हम लोग दुनिया को ये लगता है गुनहगार हैं हम लोग आब-ओ-हवा-ए-शहर ने नासाज़ किया यूँँ जैसे कि कई साल से बीमार हैं हम लोग मुद्दत से यही पूछ रहा हूँ मैं मुसलसल ये किस की बदौलत है जो मिसमार हैं हम लोग बँटवारा ये कहता है कि हम एक नहीं हैं तारीख़ ये कहती है कि हमवार हैं हम लोग गर सच नहीं मालूम तो इतिहास को पढ़ लो वरना यही समझोगे कि ग़द्दार हैं हम लोग ऐ हिंद तुझे जब भी ज़रूरत हो बताना जान अपनी लुटाने को भी तय्यार हैं हम लोग आँखों से तो अब आँसू मुसल्लों पे गिरे हैं या रब बता क्या अब भी गुनहगार हैं हम लोग हम ये भी नहीं कहते कि घर बार लुटा दो पर थोड़ी मोहब्बत के तो हक़दार हैं हम लोग हस्साम मुनाफ़िक़ से कहो होश में आए अब उस के रवय्ये से ख़बरदार हैं हम लोग — Hassam Tajub
दिवाने को कोई दिवाना मिला है कि सब कह रहे हैं ख़ज़ाना मिला है धधकती पहर में चलाए हैं जब हल तभी आप लोगों को खाना मिला है किसानों की मेहनत को क्या जानो तुम लोग बिना कुछ किए तुम को दाना मिला है पसीने की रोटी नहीं जानते हैं नवाबों का जिन को घराना मिला है उसे क्या ज़रूरत भला नौकरी की विरासत में जिस को ख़ज़ाना मिला है सफ़र में मुसलसल ग़ुज़ारे हैं दिन तब हमें आज मंज़र सुहाना मिला है तेरी चालबाज़ी न चल पाएगी अब तुझे हम सफ़र अब सियाना मिला है नया कुछ तलाशो न कमरे में मेरे मुझे हिस्से में घर पुराना मिला है किए थे किसी ने कई वादे जिस में हमें आज ख़त वो पुराना मिला है करें क्यूँ नशेमन चराग़ों से रौशन जब अंधों का हम को घराना मिला है — Hassam Tajub
दरिया भी नहीं थे तिरे साहिल भी नहीं थे हम कश्ती डुबाने में तो शामिल भी नहीं थे वो लोग जो सालों से सज़ा काट रहे हैं वो क़ातिलों की भीड़ में शामिल भी नहीं थे हम जिन की मुहब्बत में भुला बैठे हैं ख़ुद को वो कहते हैं हम प्यार के क़ाबिल भी नहीं थे जो शख़्स मिरे दिल से निकाले नहीं निकला उस शख़्स के हम दिल में तो दाख़िल भी नहीं थे ता'बीर की ख़्वाहिश में भटकते रहे लेकिन रस्ता भी नहीं थे तेरी मंज़िल भी नहीं थे वो लोग जिन्हें अपना समझते रहे अब तक वो लोग भरोसे के तो क़ाबिल भी नहीं थे तुम जिन के बिछड़ जाने पे सद में में गए हो 'हस्साम' तुम्हें लोग वो हासिल भी नहीं थे — Hassam Tajub

Nazm

"घर-बार" बाप कमाता है और बेटे सोते हैं हर घर में कुछ ऐसे नमूने होते हैं जिन को समझ आती ही नहीं ज़िम्मेदारी कुछ सालों के बा'द बहुत वो रोते हैं दाँव से बढ़ कर दाँव दिखाने लगते हैं पतझड़ में हम छाँव दिखाने लगते हैं शहरों की ता'रीफ़ कोई जब करता है उस को अपना गाँव दिखाने लगते हैं वो घर से जब घर को बनाने निकल पड़े सर पे सारे बोझ उठाने निकल पड़े ज़िम्मेदारी ने ऐसा मजबूर किया नन्हे-मुन्ने बच्चे कमाने निकल पड़े ईद दिवाली होली आती जाती है घर जाने की नौबत ही नहीं आती है ज़िम्मेदारी तुझे कैसे समझाएँ हम घर वालों की याद हमें भी आती है ख़ुद को घर से दूर बसाना पड़ता है फिर सर पे हर बोझ उठाना पड़ता है गीत ग़ज़ल लिखना इतना आसान नहीं पहले तो महबूब गँवाना पड़ता है छत आँगन दीवार उठा ले जाएँगे या'नी हम घर-बार उठा ले जाएँगे देखोगे जो क़ातिल नज़रों से हम को हो जाएगा प्यार उठा ले जाएँगे — Hassam Tajub