लाख ज़मीं बन जाए दलदल चलते चल
मुश्किल का भी निकलेगा हल चलते चल
ग़ौर न कर तानों पर दोस्त ये दुनिया है
तुझ को बेहतर करना है कल चलते चल
पाँव के छाले अब मंज़िल पर देखेंगे
रुकना ठीक नहीं है पागल चलते चल
कुछ भी मुक़र्रर है ही नहीं तो ग़म कैसा
ज़ुल्मत ए-शब भी जाएगी ढल चलते चल
यौम-ए-पैदाइश से मसाफ़त जारी है
मौत पे होगा सफ़र मुकम्मल चलते चल
अब 'हस्साम' न रख उम्मीद सहारे की
तन्हा ही चलना है मुसलसल चलते चल
— Hassam Tajub














