जब बिछड़ना तय हुआ है तुम समझते क्यूँ नहीं
वक़्त का ये फ़ैसला है तुम समझते क्यूँ नहीं
आज भी उम्मीद पाले फिर रहे हो दर-ब-दर
जाने वाला जा चुका है तुम समझते क्यूँ नहीं
नफ़रतों वाली सियासत कब तलक ऐ रहबरों
मुल्क पीछे जा रहा है तुम समझते क्यूँ नहीं
अब तो दरिया के तजावुज़ को ख़ुदाया रोक दो
घर हमारा जा रहा है तुम समझते क्यूँ नहीं
बाज़ आ जाओ सँभालो घर की ज़िम्मेदारियाँ
बाप बूढ़ा हो चुका है तुम समझते क्यूँ नहीं
जल्द आ जाओ वगरना हम जुदा हो जाएँगे
आख़िरी फेरा बचा है तुम समझते क्यूँ नहीं
हर किसी की बंदगी 'हस्साम' ये तो शिर्क है
अपना मालिक बस ख़ुदा है तुम समझते क्यूँ नहीं
— Hassam Tajub















