घर का ज़िम्मा उठा रहे हो तुम
तो सही राह जा रहे हो तुम
इक ज़माना हुआ उसे बिछड़े
अब भी मातम मना रहे हो तुम
कर के बर्बाद ज़िंदगी मेरी
अपना करियर बना रहे हो तुम
वो भी इक रोज़ छोड़ जाएगा
जिस को लॉयल बता रहे हो तुम
इस की क़ीमत चुकानी है इक दिन
हमपे जो ज़ुल्म ढा रहे हो तुम
मैं तो वाक़िफ हूँ उस की नस नस से
जिस को अच्छा बता रहे हो तुम
क्या ख़ता मुझ से हो गई साहब
क्यूँ मेरा घर गिरा रहे हो तुम
— Hassam Tajub















