कब तलक भटकें तीरगी ले करअब चले आओ रौशनी ले करअपनी हालत से अब तो लगता हैमर्ज़ गुज़रेगा आदमी ले करबज़्म में मेरी अब न आना तुमअपनी बे-बहर शा'इरी ले करजंग से हम भी लौटते ज़िंदागर गए होते बुज़दिली ले करहम भी क्या चीज़ हैं कि मुद्दत सेफिर रहे तेरी तिशनगी ले करक़ब्र का इंतिज़ार ख़त्म हुआलोग आए हैं आदमी ले कर— Hassam Tajub