मुझे अच्छा बनाना चाहता है
ये क्या मुझ से ज़माना चाहता है
लहू देकर जिसे ज़िंदा किया था
वही मुझ को मिटाना चाहता है
जिसे हम ने सिखाई थी सियासत
वही हम को हराना चाहता है
ढहा कर वो मेरे कच्चे मकाँ को
अब अपना घर बसाना चाहता है
उसी से हो रही है इस में धक धक
जिसे ये दिल भुलाना चाहता है
भरोसा ही नहीं मुझ पे तभी तो
वो मुझ को आज़माना चाहता है
मोहब्बत तक नहीं आती है जिस को
वो मुझ पे हक़ जताना चाहता है
इधर हम कर चुके हैं दिल को पत्थर
उधर वो दिल में आना चाहता है
ये क्या ज़िद है बता 'हस्साम' आख़िर
तू क्यूँ ख़ुद को रुलाना चाहता है
— Hassam Tajub















