कैसे भला मिलेगी इस आजिज़ी से फ़ुर्सत
मिलती नहीं है तुम को जब आशिक़ी से फ़ुर्सत
ग़म पहली दिल लगी का मैं सह रहा हूँ अब तक
रब जाने कब मिलेगी इस आख़िरी से फ़ुर्सत
उस शख़्स को भुलाना आसान है बहुत बस
लेनी पड़ेगी मुझ को इस ज़िंदगी से फ़ुर्सत
ख़्वाहिश में तीरगी की जो फोड़ ली हैं आँखें
अब मिल गई है हम को भी रौशनी से फ़ुर्सत
घुट-घुट के जी रहा हूँ हर रोज़ ज़िंदगी मैं
या रब तू मुझ को दे दे अब नौकरी से फ़ुर्सत
तुड़वा दिए थे उस ने ये हाथ-पाँव मेरे
'हस्साम' तब मिली थी उस की गली से फ़ुर्सत
— Hassam Tajub















