जो जाता है वो फिर वापस निभाने को नहीं आता
कोई वीरानियों में घर बसाने को नहीं आता
तुझे गर चाहिए इज़्ज़त तो ख़ुद किरदार बेहतर कर
किसी की शख़्सियत कोई बनाने को नहीं आता
हमारे अस्पतालों पर बरसते बम हैं पर कोई
हमारी मौत का मातम मनाने को नहीं आता
कभी भूखा न सोया मैं थी जब तक माँ मेरी ज़िंदा
जो अब रूठूँ तो कोई भी मनाने को नहीं आता
ख़ुदा तू ज़िंदगी भर रख सलामत मेरे वालिद को
सिवा उन के कोई हिम्मत बढ़ाने को नहीं आता
अगर 'हस्साम' उस ने दिल न तोड़ा होता तो फिर मैं
कभी भी महफ़िलों में दर्द गाने को नहीं आता
— Hassam Tajub















