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कहाँ वो बे-ख़ुदी थी कि ख़ुद हम बे-ख़बर थे
अब इतनी बेकली है कि दुनिया जानती है
कहो मुझ से कि दिल में नहीं कोई शिकायत
तबीअ'त मंचली है बहाने ढूँडती है
नमक सा गुफ़्तुगू में अनोखी मुस्कुराहट
बदन पर धीरे-धीरे क़यामत आ रही है
तुझे कैसे दिखाऊँ ये रातें ये उजाले
जवानी सो गई है मोहब्बत जागती है
उसी का शिकवा हर दम उसी का ज़िक्र सब से
अगर ये दुश्मनी है तो अच्छी दुश्मनी है
थकन है जाँ-फ़ज़ा सी बरसती है उदासी
सितारे कह रहे हैं कि मंज़िल आ गई है
पलट कर यूँ न देखो उमडते बादलों से
बहार-ए-बे-ख़िज़ाँ भी सरकती चाँदनी है
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फिर वही इंतिज़ार की ज़ंजीर
रात आई दिए जलाने लगे
छाँव पड़ने लगी सितारों की
रूह के ज़ख़्म झिलमिलाने लगे
हाल अहवाल क्या बताएँ किसे
सब इरादे गए ठिकाने लगे
मंज़िल-ए-सुब्ह आ गई शायद
रास्ते हर तरफ़ को जाने लगे
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ये जो हम कभी कभी सोचते हैं रात को
रात क्या समझ सके इन मुआमलात को
रात क्या समझ सके इन मुआमलात को
हुस्न और नजात में फ़स्ल-ए-मश्रिक़ैन है
कौन चाहता नहीं हुस्न को नजात को
ये सुकून-ए-बे-जिहत ये कशिश अजीब है
तुझ में बंद कर दिया किस ने शश-जहात को
साहिल-ए-ख़याल पर कहकशाँ की छूट थी
एक मौज ले गई इन तजल्लियात को
आँख जब उठे भर आए शे'र अब कहा न जाए
कैसे भूल जाए वो भूलने की बात को
देख ऐ मिरी निगाह तू भी है जहाँ भी है
किस ने बा-ख़बर किया दूसरे की ज़ात को
क्या ऐ मिरी निगाह तू भी है जहाँ भी है
किस ने बा-ख़बर कहा दूसरे की ज़ात को
क्या हुईं रिवायतें अब हैं क्यूँ शिकायतें
इशक़-ए-ना-मुराद से हुस्न-ए-बे-सबात को
ऐ बहार-ए-सर-गिराँ तू ख़िज़ाँ-नसीब है
और हम तरस गए तेरे इल्तिफ़ात को
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मोहब्बत को गले का हार भी करते नहीं बनता
कुछ ऐसी बात है इनकार भी करते नहीं बनता
कुछ ऐसी बात है इनकार भी करते नहीं बनता
ख़ुलूस-ए-नाज़ की तौहीन भी देखी नहीं जाती
शुऊर-ए-हुस्न को बेदार भी करते नहीं बनता
तुझे अब क्या कहें ऐ मेहरबाँ अपना ही रोना है
कि सारी ज़िंदगी ईसार भी करते नहीं बनता
सितम देखो कि उस बे-दर्द से अपनी लड़ाई है
जिसे शर्मिंदा-ए-पैकार भी करते नहीं बनता
अदा रंजीदगी परवानगी आँसू-भरी आँखें
अब इतनी सादगी क्या प्यार भी करते नहीं बनता
जवानी मेहरबानी हुस्न भी अच्छी मुसीबत है
उसे अच्छा उसे बीमार भी करते नहीं बनता
भँवर से जी भी घबराता है लेकिन क्या किया जाए
तवाफ़-ए-मौज-ए-कम-रफ़्तार भी करते नहीं बनता
इसी दिल को भरी दुनिया के झगड़े झेलने ठहरे
यही दिल जिस को दुनिया-दार भी करते नहीं बनता
जलाती है दिलों को सर्द-मेहरी भी ज़माने की
सवाल-ए-गर्मी-ए-बाज़ार भी करते नहीं बनता
'ख़िज़ाँ' उन की तवज्जोह ऐसी ना-मुम्किन नहीं लेकिन
ज़रा सी बात पर इसरार भी करते नहीं बनता
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सबब तलाश न कर बस यूँही है ये दुनिया
वही बहुत है जो कुछ जानती है ये दुनिया
वही बहुत है जो कुछ जानती है ये दुनिया
खुलत में बंद हैं कोंपल के सोते जागते रंग
परत परत में नई दिलकशी है ये दुनिया
उलझते रहने में कुछ भी नहीं थकन के सिवा
बहुत हक़ीर हैं हम तुम बड़ी है ये दुनिया
ये लोग साँस भी लेते हैं ज़िंदा भी हैं मगर
हर आन जैसे इन्हें रोकती है ये दुनिया
बहुत दिनों तो ये शर्मिंदगी थी शामिल-ए-हाल
हमीं ख़राब हैं अच्छी भली है ये दुनिया
हरे-भरे रहें तेरे चमन तिरे गुलज़ार
हरा है ज़ख़्म-ए-तमन्ना भरी है ये दुनिया
तुम अपनी लहर में हो और किसी भँवर की तरह
मैं दूसरा हूँ कोई तीसरी है ये दुनिया
वो अपने साथ भी रहते हैं चुप भी रहते हैं
जिन्हें ख़बर है कि क्या बेचती है ये दुनिया
'ख़िज़ाँ' न सोच कि बिकती है क्यूँ बदन की बहार
समझ कि रूह की सौदा-गरी है ये दुनिया
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दुख बहुत हैं ज़िंदगी में क्या करेंगे हम
वो जो तेरा फ़र्ज़ था अदा करेंगे हम
वो जो तेरा फ़र्ज़ था अदा करेंगे हम
दिन को इतने काम किस तरह करेगा कौन
रात भर तो जागते रहा करेंगे हम
आधी उम्र कट गई ख़याल-ओ-ख़्वाब में
शे'र सब कहेंगे और सुना करेंगे हम
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ये सर्द-मेहर उजाला ये जीती-जागती रात
तिरे ख़याल से तस्वीर-ए-माह जलती है
वो चाल हो कि बदन हो कमान जैसी कशिश
क़दम से घात अदास अदा निकलती है
तुम्हें ख़याल नहीं किस तरह बताएँ तुम्हें
कि साँस चलती है लेकिन उदास चलती है
तुम्हारे शहर का इंसाफ़ है अजब इंसाफ़
इधर निगाह उधर ज़िंदगी बदलती है
बिखर गए मुझे साँचे में ढालने वाले
यहाँ तो ज़ात भी साँचे समेत ढलती है
ख़िज़ाँ है हासिल-ए-हंगामा-ए-बहार 'ख़िज़ाँ'
बहार फूलती है काएनात फलती है
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हाल ऐसा नहीं कि तुम से कहें
एक झगड़ा नहीं कि तुम से कहें
एक झगड़ा नहीं कि तुम से कहें
ज़ेर-ए-लब आह भी मुहाल हुई
दर्द इतना नहीं कि तुम से कहें
तुम ज़ुलेख़ा नहीं कि हम से कहो
हम मसीहा नहीं कि तुम से कहें
सब समझते हैं और सब चुप हैं
कोई कहता नहीं कि तुम से कहें
किस से पूछें कि वस्ल में क्या है
हिज्र में क्या नहीं कि तुम से कहें
अब 'ख़िज़ाँ' ये भी कह नहीं सकते
तुम ने पूछा नहीं कि तुम से कहें
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हम आप क़यामत से गुज़र क्यूँ नहीं जाते
जीने की शिकायत है तो मर क्यूँ नहीं जाते
जीने की शिकायत है तो मर क्यूँ नहीं जाते
कतराते हैं बल खाते हैं घबराते हैं क्यूँ लोग
सर्दी है तो पानी में उतर क्यूँ नहीं जाते
आँखों में नमक है तो नज़र क्यूँ नहीं आता
पलकों पे गुहर हैं तो बिखर क्यूँ नहीं जाते
अख़बार में रोज़ाना वही शोर है या'नी
अपने से ये हालात सँवर क्यूँ नहीं जाते
ये बात अभी मुझ को भी मालूम नहीं है
पत्थर इधर आते हैं उधर क्यूँ नहीं जाते
तेरी ही तरह अब ये तिरे हिज्र के दिन भी
जाते नज़र आते हैं मगर क्यूँ नहीं जाते
अब याद कभी आए तो आईने से पूछो
'महबूब-ख़िज़ाँ' शाम को घर क्यूँ नहीं जाते
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