sambhaalne se tabeeyat kahaan sambhalti hai | सँभालने से तबीअत कहाँ सँभलती है

  - Mahboob Khizan

सँभालने से तबीअत कहाँ सँभलती है
वो बे-कसी है कि दुनिया रगों में चलती है

ये सर्द-मेहर उजाला ये जीती-जागती रात
तिरे ख़याल से तस्वीर-ए-माह जलती है

वो चाल हो कि बदन हो कमान जैसी कशिश
क़दम से घात अदास अदा निकलती है

तुम्हें ख़याल नहीं किस तरह बताएँ तुम्हें
कि साँस चलती है लेकिन उदास चलती है

तुम्हारे शहर का इंसाफ़ है 'अजब इंसाफ़
इधर निगाह उधर ज़िंदगी बदलती है

बिखर गए मुझे साँचे में ढालने वाले
यहाँ तो ज़ात भी साँचे समेत ढलती है

ख़िज़ाँ है हासिल-ए-हंगामा-ए-बहार 'ख़िज़ाँ'
बहार फूलती है काएनात फलती है

  - Mahboob Khizan

Yaad Shayari

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