Mahboob Khizan

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Mahboob Khizan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Mahboob Khizan's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

बात ये है कि आदमी शाइ'र या तो होता है या नहीं होता — Mahboob Khizan
कतराते हैं बल खाते हैं घबराते हैं क्यूँँ लोग सर्दी है तो पानी में उतर क्यूँँ नहीं जाते — Mahboob Khizan

Ghazal

ये जो हम कभी कभी सोचते हैं रात को रात क्या समझ सके इन मुआमलात को हुस्न और नजात में फ़स्ल-ए-मश्रिक़ैन है कौन चाहता नहीं हुस्न को नजात को ये सुकून-ए-बे-जिहत ये कशिश अजीब है तुझ में बंद कर दिया किस ने शश-जहात को साहिल-ए-ख़याल पर कहकशाँ की छूट थी एक मौज ले गई इन तजल्लियात को आँख जब उठे भर आए शे'र अब कहा न जाए कैसे भूल जाए वो भूलने की बात को देख ऐ मिरी निगाह तू भी है जहाँ भी है किस ने बा-ख़बर किया दूसरे की ज़ात को क्या ऐ मिरी निगाह तू भी है जहाँ भी है किस ने बा-ख़बर कहा दूसरे की ज़ात को क्या हुईं रिवायतें अब हैं क्यूँँ शिकायतें इशक़-ए-ना-मुराद से हुस्न-ए-बे-सबात को ऐ बहार-ए-सर-गिराँ तू ख़िज़ाँ-नसीब है और हम तरस गए तेरे इल्तिफ़ात को — Mahboob Khizan
जुनूँ से खेलते हैं आगही से खेलते हैं यहाँ तो अहल-ए-सुख़न आदमी से खेलते हैं निगार-मय-कदा सब से ज़ियादा क़ाबिल-ए-रहम वो तिश्ना-काम हैं जो तिश्नगी से खेलते हैं तमाम उम्र ये अफ़्सुर्दगान-ए-महफ़िल-ए-गुल कली को छेड़ते हैं बे-कली से खेलते हैं फ़राज़-ए-इश्क़ नशेब-ए-जहाँ से पहले था किसी से खेल चुके हैं किसी से खेलते हैं नहा रही है धनक ज़िंदगी के संगम पर पुराने रंग नई रौशनी से खेलते हैं जो खेल जानते हैं उन के और हैं अंदाज़ बड़े सुकून बड़ी सादगी से खेलते हैं 'ख़िज़ाँ' कभी तो कहो एक इस तरह की ग़ज़ल कि जैसे राह में बच्चे ख़ुशी से खेलते हैं — Mahboob Khizan
ख़्वाब से पर्दा करो देखो मत अब अगर देख सको देखो मत गिरते शहतीरों के जंगल हैं ये शहर चुप रहो चलते रहो देखो मत झूट सच दोनों ही आईने हैं उस तरफ़ कोई न हो देखो मत हुस्न क्या एक चमन इक कोहराम तेज़-ओ-आहिस्ता चलो देखो मत पंखुड़ी एक परत और परत क्यूँँ बखेड़े में पढ़ो देखो मत हर कली एक भँवर इक बादल खेल में खेल न हो देखो मत ये पुरानी ये अनोखी ख़ुशबू कुछ दिन आवारा फिरो देखो मत हर तरफ़ देखने वाली आँखें उन के साए से बचो देखो मत कम-लिबासी हो गिला या इसरार बे-ख़बर जैसे रहो देखो मत आफ़ियत इस में है ग़ाफ़िल गुज़रो मत निगाहों से गिरो देखो मत केंचुली हट गई ज़िंदा रेशम फिर ये कहता है हटो देखो मत देखते देखते मंज़र है कुछ और धूल आँखों में भरो देखो मत सत्ह के नीचे है क्या जाने कौन लहर की लय पे बढ़ो देखो मत एक ही जल है यहाँ माया-जल प्यास के जाल बुनो देखो मत — Mahboob Khizan
मोहब्बत पर न भूलो मोहब्बत बे-कसी है सुकून-ए-सर्व-ओ-सुंबुल सब अपनी सादगी है कहाँ वो बे-ख़ुदी थी कि ख़ुद हम बे-ख़बर थे अब इतनी बेकली है कि दुनिया जानती है कहो मुझ से कि दिल में नहीं कोई शिकायत तबीअ'त मंचली है बहाने ढूँडती है नमक सा गुफ़्तुगू में अनोखी मुस्कुराहट बदन पर धीरे-धीरे क़यामत आ रही है तुझे कैसे दिखाऊँ ये रातें ये उजाले जवानी सो गई है मोहब्बत जागती है उसी का शिकवा हर दम उसी का ज़िक्र सब से अगर ये दुश्मनी है तो अच्छी दुश्मनी है थकन है जाँ-फ़ज़ा सी बरसती है उदासी सितारे कह रहे हैं कि मंज़िल आ गई है पलट कर यूँँ न देखो उमडते बादलों से बहार-ए-बे-ख़िज़ाँ भी सरकती चाँदनी है — Mahboob Khizan
हसरत-ए-आब-ओ-गिल दोबारा नहीं देख दुनिया नहीं हमेशा नहीं सोचने का कोई नतीजा नहीं साया है ए'तिबार-ए-साया नहीं सादा-कारी कई परत कई रंग सादगी इक अदा-ए-सादा नहीं अच्छे लगते हैं अच्छे लोग मुझे जो समझते हैं उन से पर्दा नहीं मैं कहीं और किस तरह जाऊँ तू किसी और के अलावा नहीं तुझ से भागे सुकून से भागे सर-गराँ हैं कि दिल-गिरफ़्ता नहीं रात ज़ंजीर सी क़दम-ब-क़दम एक मंज़िल है कोई जादा नहीं हुस्न तो हो चला ज़माना-शनास इश्क़ का भी कोई भरोसा नहीं सुनते हैं इक जज़ीरा है कि जहाँ ये बला-ए-हवा से-ए-ख़मसा नहीं ऐ सितारो किसे पुकारते हो इस ख़राबे में कोई ज़िंदा नहीं चाँदनी खेलती है पानी से इतनी बरसात है कि सब्ज़ा नहीं कैसे बे-दर्द हैं कि जोड़ते हैं नरम अल्फ़ाज़ जिन में रिश्ता नहीं कहीं ईजाद महज़ बे-मफ़्हूम कहीं मफ़्हूम है तो लहजा नहीं कहीं तस्वीर नाक-नक़्शे बग़ैर कहीं दीवार है दरीचा नहीं उन से काग़ज़ में जान कैसे पड़े जिन की आँखों में अक्स-ए-ताज़ा नहीं दुश्मनी है तो दुश्मनी ही सही मैं नहीं या दुकान-ए-शीशा नहीं ख़ाक से किस ने उठते देखी है वो क़यामत कि इस्तिआ'रा नहीं कभी हर साँस में ज़मान-ओ-मकाँ कभी बरसों में एक लम्हा नहीं बेकली तार कसती जाए 'ख़िज़ाँ' हसरत-ए-आब-ओ-गिल दोबारा नहीं — Mahboob Khizan
हम आप क़यामत से गुज़र क्यूँँ नहीं जाते जीने की शिकायत है तो मर क्यूँँ नहीं जाते कतराते हैं बल खाते हैं घबराते हैं क्यूँँ लोग सर्दी है तो पानी में उतर क्यूँँ नहीं जाते आँखों में नमक है तो नज़र क्यूँँ नहीं आता पलकों पे गुहर हैं तो बिखर क्यूँँ नहीं जाते अख़बार में रोज़ाना वही शोर है या'नी अपने से ये हालात सँवर क्यूँँ नहीं जाते ये बात अभी मुझ को भी मालूम नहीं है पत्थर इधर आते हैं उधर क्यूँँ नहीं जाते तेरी ही तरह अब ये तिरे हिज्र के दिन भी जाते नज़र आते हैं मगर क्यूँँ नहीं जाते अब याद कभी आए तो आईने से पूछो 'महबूब-ख़िज़ाँ' शाम को घर क्यूँँ नहीं जाते — Mahboob Khizan
मोहब्बत को गले का हार भी करते नहीं बनता कुछ ऐसी बात है इनकार भी करते नहीं बनता ख़ुलूस-ए-नाज़ की तौहीन भी देखी नहीं जाती शुऊर-ए-हुस्न को बेदार भी करते नहीं बनता तुझे अब क्या कहें ऐ मेहरबाँ अपना ही रोना है कि सारी ज़िंदगी ईसार भी करते नहीं बनता सितम देखो कि उस बे-दर्द से अपनी लड़ाई है जिसे शर्मिंदा-ए-पैकार भी करते नहीं बनता अदा रंजीदगी परवानगी आँसू-भरी आँखें अब इतनी सादगी क्या प्यार भी करते नहीं बनता जवानी मेहरबानी हुस्न भी अच्छी मुसीबत है उसे अच्छा उसे बीमार भी करते नहीं बनता भँवर से जी भी घबराता है लेकिन क्या किया जाए तवाफ़-ए-मौज-ए-कम-रफ़्तार भी करते नहीं बनता इसी दिल को भरी दुनिया के झगड़े झेलने ठहरे यही दिल जिस को दुनिया-दार भी करते नहीं बनता जलाती है दिलों को सर्द-मेहरी भी ज़माने की सवाल-ए-गर्मी-ए-बाज़ार भी करते नहीं बनता 'ख़िज़ाँ' उन की तवज्जोह ऐसी ना-मुम्किन नहीं लेकिन ज़रा सी बात पर इसरार भी करते नहीं बनता — Mahboob Khizan
आइने कहते हैं इस ख़्वाब को रुस्वा न करो ऐसे खोए हुए अंदाज़ से देखा न करो कैसे आ जाती है कोंपल पे ये जादू की लकीर दिन गुज़र जाते हैं महसूस करो या न करो कहीं दीवार-ए-क़यामत कभी ज़ंजीर-ए-अज़ल क्या करो इश्क़-ए-ज़ियाँ-ए-केश में और क्या न करो भागते जाओ किसी सम्त किसी साए से तज़्किरा एक है अफ़्साना-दर-अफ़्साना करो फिर कोई ताज़ा घरौंदा किसी वीराने में गाँव को शहर करो शहर को वीराना करो बज़्म-ए-इम्काँ हुई दो घूँट लहू आँखों में हिर्स कहती है कि कौनैन को पैमाना करो क्यूँँ न हो मुझ से शिकायत तुम्हीं तुम वो हो कि फिर उसे जीता भी न छोड़ो जिसे दीवाना करो एक ही रात सही फूल तो खुलते हैं 'ख़िज़ाँ' मौत में क्या है कि जीने की तमन्ना न करो — Mahboob Khizan
ख़िज़ाँ' में ख़ूबियाँ ऐसे बहुत हैं ख़राबी एक है बनते बहुत हैं कोई रस्ता कहीं जाए तो जानें बदलने के लिए रस्ते बहुत हैं नई दुनिया के सुंदर बन के अंदर पुराने वक़्त के पौदे बहुत हैं हुए जब से ज़माने भर के हम-राह हम अपने साथ भी थोड़े बहुत हैं लगावट है सितारों से पुरानी रक़ाबत है मगर मिलते बहुत हैं बहुत होगा तो ये सोचोगे शायद कि हम भी थे यहाँ जैसे बहुत हैं है सब सूरत का चक्कर, ख़्वाब मअ'नी दिखाए हैं बहुत देखे बहुत हैं जसारत दिल में क्या हो फ़न में क्या हो मुलाज़िम-पेशा हैं डरते बहुत हैं किसी से क्यूँँ उलझते क्या उलझते ये धागे ख़ुद-ब-ख़ुद उलझे बहुत हैं थकन चारों तरफ़ है चलते जाओ पहुँचता कौन है चलते बहुत हैं ख़फ़ा हम से न हो ऐ चश्म-ए-जानाँ हम इस अंदाज़ पर मरते बहुत हैं कहो ये भी 'ख़िज़ाँ' कहने से पहले जो कहते कुछ नहीं कहते बहुत हैं — Mahboob Khizan
सबब तलाश न कर बस यूँँही है ये दुनिया वही बहुत है जो कुछ जानती है ये दुनिया खुलत में बंद हैं कोंपल के सोते जागते रंग परत परत में नई दिलकशी है ये दुनिया उलझते रहने में कुछ भी नहीं थकन के सिवा बहुत हक़ीर हैं हम तुम बड़ी है ये दुनिया ये लोग साँस भी लेते हैं ज़िंदा भी हैं मगर हर आन जैसे इन्हें रोकती है ये दुनिया बहुत दिनों तो ये शर्मिंदगी थी शामिल-ए-हाल हमीं ख़राब हैं अच्छी भली है ये दुनिया हरे-भरे रहें तेरे चमन तिरे गुलज़ार हरा है ज़ख़्म-ए-तमन्ना भरी है ये दुनिया तुम अपनी लहर में हो और किसी भँवर की तरह मैं दूसरा हूँ कोई तीसरी है ये दुनिया वो अपने साथ भी रहते हैं चुप भी रहते हैं जिन्हें ख़बर है कि क्या बेचती है ये दुनिया 'ख़िज़ाँ' न सोच कि बिकती है क्यूँँ बदन की बहार समझ कि रूह की सौदा-गरी है ये दुनिया — Mahboob Khizan

Nazm

बे-कस चमेली फूले अकेली आहें भरे दिल-जली भूरी पहाड़ी ख़ाकी फ़सीलें धानी कभी साँवली जंगल में रस्ते रस्तों में पत्थर पत्थर पे नीलम-परी लहरीली सड़कें चलते मनाज़िर बिखरी हुई ज़िंदगी बादल चटानें मख़मल के पर्दे पर्दों पे लहरें पड़ीं काकुल पे काकुल ख़ेमों पे ख़ेमे सिलवट पे सिलवट हरी बस्ती में गंदी गलियों के ज़ीने लड़के धमा-चौकड़ी बरसे तो छागल ठहरे तो हलचल राहों में इक खलबली गिरते घरौंदे उठती उमंगें हाथों में गागर भरी कानों में बाले चाँदी के हाले पलकें घनी खुरदुरी हड्डी पे चेहरे चेहरों पे आँखें आई जवानी चली टीलों पे जौबन रेवड़ के रेवड़ खेतों पे झालर चढ़ी वादी में भीगे रोड़ों की पेटी चश्मों की चंपाकली साँचे नए और बातें पुरानी मिट्टी की जादूगरी — Mahboob Khizan
मैं तुम्हारी रूह की अंगड़ाइयों से आश्ना हूँ मैं तुम्हारी धड़कनों के ज़ेर-ओ-बम पहचानता हूँ मैं तुम्हारी अँखड़ियों में नर्म लहरें जागती सी देखता हूँ जैसे जादू जागता हो तुम अमर हो तो लचकती टहनियों की मामता हो तुम जवानी हो तबस्सुम हो मोहब्बत की लता हो मैं तुम्हें पहचानता हूँ तुम मिरी पहली ख़ता हो लहलहाती झूमती फुलवारियों की ताज़गी हो बे-अदाई की अदा हो तेज़ मंडलाती अबाबीलों के नन्हे बाज़ुओं का हौसला हो फूल हो और फूल के अंजाम से ना-आश्ना हो डालियों पर फूलती हो झूलती हो देखती हो भूलती हो हर नए फ़ानूस पे गिरती हुई परवानगी हो और ख़ुद भी रौशनी हो ज़िंदगी हो ज़िंदगी के गिर्द चक्कर काटती हो मैं तुम्हें पहचानता हूँ तुम मोहब्बत चाहती हो ख़ुद को देखो और भरी दुनिया को देखो और सोचो और सोचो तुम कहाँ हो — Mahboob Khizan
वो हसीन थी मह-ए-जबीन थी बे-गुमान थी बे-यक़ीन थी ज़िंदगी की नरम नरम आहटें बे-सबब यूँँही मुस्कुराहटें उँगलियों में बाल को लपेटना दामन-ए-ख़याल को लपेटना हर घड़ी वही मिलने वालियाँ बे-ख़यालियां ख़ुश-ख़यालियां नर्म उलझनें कम-सिनी के ख़्वाब अंग अंग में छेड़ा इंक़लाब मुँह पर ओढ़नी जी कभी नहीं मैं तो आप से बोलती नहीं और फिर हया ज़िंदगी की मार मा'रिफ़त का बोझ जब्र-ओ-इख़्तियार एक जान और सैंकड़ों वबाल जिस्म की दुखन रूह का ख़याल ज़िंदगी बढ़ी रौशनी लिए रौशनी बढ़ी तीरगी लिए इंकिसार में इक ग़ुरूर सा कुछ ख़ुमार सा कुछ सुरूर सा दाएरे यहाँ दाएरे वहाँ रक़्स में नज़र रक़्स में जहाँ गुफ़्तुगू में बल ख़ामुशी में लोच रात करवटें करवटों में सोच दिल बुझा बुझा तिश्नगी की आँच अजनबी थकन ज़िंदगी की आँच उस के काम आएँ उस का दुख बटाएँ उस को छेड़ दें और मुस्कुराएँ उस की आँख में कितना दर्द है रंग ज़र्द है रूह ज़र्द है वो उदास है क्यूँँ उदास है उस की ज़िंदगी किस के पास है ये गुनाह क्यूँँ भूल क्यूँँ नहीं बाग़ में तमाम फूल क्यूँँ नहीं — Mahboob Khizan
मैं ने महसूस किया है तो खुली हैं आँखें मैं ने महसूस किया है तो जले हैं ये चराग़ ये चराग़ाँ ये चमन कैसे मिले उन से नजात साँस लेने को ठहर जाओ तो जादू का हिसार हर तरफ़ शोला-ज़बाँ नाग हैं फन झूमते हैं सर उठाते हैं नए राग नई रागनियाँ पाँव पड़ते हैं गले पड़ते हैं अनजाने ख़याल क्या मिरे पास मगर एक थकन एक उमंग एक जीने की लगन एक मोहब्बत का लहू न अँधेरे न उजाले से अदावत है मुझे रात है दिन है मगर मुझ को तो दोनों से है काम काम झूटा हो तो पहचानने वाले भी कई रंग सच्चे भी न हों लोग बुरा मानते हैं चलती-फिरती हैं दरीचों में कई तस्वीरें क्या करूँँ मैं तिरी दुनिया है मिरी आँखें हैं रात और दिन में कोई फ़र्क़ नहीं है ऐसा मैं ने महसूस किया है तो खुली हैं आँखें मैं ने महसूस किया है तो जले हैं ये चराग़ — Mahboob Khizan
ज़िंदगी को देखा है ज़िंदगी से भागे हैं रौशनी के आँचल में तीरगी के धागे हैं तीरगी के धागों में ख़ून की रवानी है दर्द है मोहब्बत है हुस्न है जवानी है हर तरफ़ वही अंधा खेल है अनासिर का तैरता चले साहिल डूबता चले दरिया चाँद हो तो काकुल की लहर और चढ़ती है रात और घटती है बात और बढ़ती है ये कशिश मगर क्या है रेशमी लकीरों में शाम कैसे होती है नाचते जज़ीरों में हर क़दम नई उलझन सौ तरह की ज़ंजीरें फ़लसफ़ों के वीराने दूसरों की जागीरें आँधियाँ उजालों की घन-गरज सियासत की काँपते हैं सय्यारे रात है क़यामत की जंग से जले दुनिया चाँद को चले पागल आँख पर गिरे बिजली कान में पड़े काजल दौर है परिंदों का छेड़ है सितारों से काएनात आजिज़ है हम गुनाहगारों से — Mahboob Khizan