chaahi thii dil ne tujh se vafaa kam bahut hi kam | चाही थी दिल ने तुझ से वफ़ा कम बहुत ही कम

  - Mahboob Khizan

चाही थी दिल ने तुझ से वफ़ा कम बहुत ही कम
शायद इसी लिए है गिला कम बहुत ही कम

क्या हुस्न था कि आँख लगी साया हो गया
वो सादगी की मार, हया कम बहुत ही कम

थे दूसरे भी तेरी मोहब्बत के आस-पास
दिल को मगर सुकून मिला कम बहुत ही कम

जलते सुना चराग़ से दामन हज़ार बार
दामन से कब चराग़ जला कम बहुत ही कम

अब रूह काँपती है अजल है क़रीब-तर
ऐ हम-नसीब नाज़-ओ-अदा कम बहुत ही कम

यूँँ मत कहो 'ख़िज़ाँ' कि बहुत देर हो गई
हैं आज-कल वो तुम से ख़फ़ा कम बहुत ही कम

  - Mahboob Khizan

Wafa Shayari

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