पलकों पर हसरत की घटाएँ हम भी पागल तुम भी
जी न सकें और मरते जाएँ हम भी पागल तुम भी
दोनों अपनी आन के सच्चे दोनों अक़्ल के अंधे
हाथ बढ़ाएँ फिर हट जाएँ हम भी पागल तुम भी
ख़्वाब में जैसे जान छुड़ा कर भाग न सकने वाले
भागें और वहीं रह जाएँ हम भी पागल तुम भी
संदल फूले जंगल जागे नाग फिरीं मतवाले
नंगे पाँव चलें घबराएँ हम भी पागल तुम भी
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Mahboob Khizan
our suggestion based on Mahboob Khizan
As you were reading Aashiq Shayari Shayari