Pritesh Bunker

Pritesh Bunker

@prit_bunker

Prit shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Prit's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Mizaaj
  • Sher(183)
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Sher

आज उस से बिछड़ के हम ने 'प्रीत' कितना नज़दीक पाया है उस को — Pritesh Bunker
आप कुछ ज़्यादा अपने आप से हैं वरना मुझ में तो कोई भी कमी नइँ — Pritesh Bunker
उसे बिन देखे देख लेते हैं हम वो हमें देख कर भी देखती नइँ — Pritesh Bunker
इश्क़ कर 'प्रीत' इश्क़ कर बस इश्क़ आप हो जाएँगे बचे सब काम — Pritesh Bunker
पास थे हम मगर कुछ ऐसे थे जनवरी थी वो मैं दिसंबर था — Pritesh Bunker
कोई पलटे भी इस को तो कैसे दर्द का उल्टा भी तो दर्द ही है — Pritesh Bunker
उसे हर वक़्त करता हूँ महसूस वो जिसे आज तक छुआ ही नहीं — Pritesh Bunker
अपना किरदार काम आया नहीं बदचलन नौकरी जो करता था — Pritesh Bunker
इश्क़ क्या कम है कर्बला से 'प्रीत' झुकते ही सिर यहाँ भी कटता है — Pritesh Bunker
कभी ब्याही थी बेटियाँ हम ने कभी की थी ज़कात फूलों की — Pritesh Bunker
शिफ़ा की बात आए तो सुख़न की मार मिलती है दिल-ए-बीमार को उम्मीद भी बीमार मिलती है — Pritesh Bunker
'प्रीत' जिस तिस बहाने कर भी ले एक तितली से बात फूलों की — Pritesh Bunker
नौकरी पा के लौटा मैं जब घर देखा तो उस की शादी हो चुकी थी — Pritesh Bunker
जिस की ख़ातिर तड़पता हूँ इतना मर न जाऊँ अगर वो मिल जाए — Pritesh Bunker
घर की हालत ने कर दिया दाना वरना मैं भी बला का पागल था — Pritesh Bunker
इश्क़ उस वक़्त बाज़ी जीत गया हार का हार पहना जब दिल ने — Pritesh Bunker
हुस्न की इक परी है जान मेरी सो रक़ीब आसमान है मेरा — Pritesh Bunker
पहले मूरत में प्राण डाले फिर आदमी आप हो गया पत्थर — Pritesh Bunker

Ghazal

शायद उस ने कभी वफ़ा की ही नइँ जो ये कहता है आँखें बोलती नइँ किसी पे इक दफ़ा दिल आ जाए बंदा क्या फिर तो रब की चलती नइँ तेरी ख़ामोशी भी सुनी मैं ने तू ने आवाज़ भी मेरी सुनी नइँ घर से दफ़्तर तलक सफ़र है सिर्फ़ मौत है जानी फिर ये ज़िंदगी नइँ उस को कैसे बुरी लगी मेरी बात बात भी वो कभी जो मैं ने की नइँ उसे बिन देखें देख लेते हैं हम वो हमें देख कर भी देखती नइँ आप कुछ ज़्यादा अपने आप से हैं वरना मुझ में तो कोई भी कमी नइँ कभी चुप रह के कितना कहती है कभी वो बोलकर भी बोलती नइँ 'प्रीत' आज़ादी ऐसी जैसे हो क़ैद क़ैद ऐसी जहाँ गिरफ़्तगी नइँ — Pritesh Bunker

Nazm

"अब तो लौट आओ" ये घर अब मकाँ हो चुका है, अब तो लौट आओ सारा गाँव वीराँ हो चुका है, अब तो लौट आओ गाँव के आख़िर में एक दरिया था ये कहूँ कि मेरा नज़रिया था शीतल था जल उस का, मद्धम मद्धम बहता था आ कर मेरे कानों में, कोई ग़ज़ल कहता था वो मीठा जल अब सूख चुका है कहीं समुंदर में जा कर मिल चुका है वो दरिया अब दरिया नहीं रहा खारे पानी की दुकाँ हो चुका है, अब तो लौट आओ दरिया किनारे वो पीपल का पेड़, शीतल छाँव देता था, हवा संग लहराता था मैं पूरे दिन बस वहीं रहता था एक हवा का झोंका था सुकून भरा, सादगी भरा तन को, मन को, जो करता हरा सुब्ह को जाता था, शाम हुए लौट कर आता था अब वो झोंका भी कई दिनों से लौटा नहीं मालूम हुआ भयंकर तूफाँ हो चुका है, अब तो लौट आओ वो गाँव का चबूतरा, वो बरगद का पेड़ उस के बाजू में वो मिट्टी का ढेर बच्चे जहाँ घरौंदे बना कर खेलते थे उस पेड़ के साए में कुछ पंछी रहते थे वो बूढ़ा बाज़, मेरा दर्द, मेरे दिल की आवाज़ वो मोर जो बरसात में नाचता था आँखें भीग आती थी, तेरी याद दिलाता था वो चिड़िया जो रोज़ दाना चुगने जाती थी हक़ीक़त में वो तुम्हें ढूंँढने आती थी वो कबूतर जो सब सेे सयाना था मेरे पास बैठ कर, सुनता तेरा अफ़साना था तेरी आँखें, तेरी ज़ुल्फ़ें, तेरी ख़ामोशी, तेरी बातें जो भी मैं लिखता, वो सब कुछ पढ़ता वो ख़त देने को तुझे, हर दिशा में उड़ता हज़ारों कोशिशों के बा'द वो नाकाम हो चुका है उड़ते उड़ते थक गया है, गिर कर मर चुका है अब तो लौट आओ वो ख़ेतों में उगती फ़सल, जहाँ पनपती थी मेरी ग़ज़ल वो गाँव का तालाब, जहाँ ऊगा था सुंदर कमल तालाब किनारे वो कीचड़ जिस से मैं ने ताजमहल बनाया था मेरी रूह क़ैद थी, उस में तेरा साया था एक दिन सुनामी आई, सब कुछ बह गया वो मुहब्बत का ताजमहल, वहीं पर ढह गया सब तबाह हो गया, कुछ न बचा अब बस "प्रीत" बाकी था तेरी याद में लिखता रहता रोज़ थोड़ा थोड़ा मरता रहता एक दिन ऐसा आया सब्र इंतहा कर गया तेरी याद में रोते रोते तेरा "प्रीत" मर गया अब कुछ भी न रहा, कुछ भी न बचा सब कुछ शमशान हो चुका है, अब तो लौट आओ — Pritesh Bunker
"तुम्हारा ख़याल" भोर में सूरज की हल्की रौशनी से जब नदी का जल चमक जाता है तुम्हारा अक्स मुझे नज़र आता है निशा में; महताब की चाँदनी तले टिमटिमाते तारों को देखता हूँ तुम्हारा चेहरा निखर आता है हल्की बारिश के बा'द मिट्टी से आने वाली गंध सी हो तुम किसी पवित्र ग्रंथ सी हो तुम लापता हूँ मैं ख़ुद ही में मुझ में बसी हो तुम रूह की रूहानियत हो आँखों की नमी हो तुम तुम्हारी आवाज़ कोयल की मीठी बोली सी लगती हँ तुम हो तो मैं हूँ तुम्हीं से मेरी साँसे चलती हैं पंछियों की चहचहाहट से तुम्हारा मुस्कुराना याद आता है जब भी इबादत करे 'प्रीत' तुम्हारा ज़िक्र हो ही जाता है — Pritesh Bunker
"एक दिन" एक दिन तुम उठोगी बिस्तर से तुम्हें मेरा ख़्याल आएगा और याद आएगी मेरी मोहब्बत, मेरी बातें कैसे एक शख़्स ने तुम्हें चाहा था बेइंतहा और फिर तुम मेरी तस्वीर देखोगी तुम्हारी आँखों में आँसू होंगे तुम चाहकर भी मुझे भुला नहीं पाओगी अभी तो तुम मुक़र जाओगी मगर उस वक़्त किधर जाओगी? घर की दर-ओ-दीवार देखोगी मेरी तस्वीरें बनती नज़र आएगी दहलीज़ से मेरी सदाएँ आएगी तुम मेरी यादों में ख़ुद को तन्हा पाओगी और सोचोगी अपने इस अंदाज़ पर जिस तरह तुम ने मुझे रुलाया, सताया मगर तब मैं वहाँ नहीं रहूँगा फूलों की ख़ुशबुओं में बारिश की बूंदों में सुब्ह की चाय में मुझे देखोगी, मुझे ही पाओगी हर शख़्स में मेरा चेहरा दिखेगा निगाहों में मेरे ख़्वाबों का पहरा होगा ज़ेहन में बस मेरे ख़याल आएँगे मेरी पाक मोहब्बत होगी और तुम्हारा दिल उस वक़्त तुम सेे सवाल पूछेगा क्या कमी थी उस में जो इस तरह तन्हा किया वो शख़्स जो मुझ सेे मोहब्बत करता था उसे इस तरह रुस्वा किया इसी सोच में डूबी तुम ख़ुद ही रोने लग जाओगी पछताओगी और उस वक़्त, बस उस वक़्त मेरी यादों में खो जाओगी — Pritesh Bunker
"मैं मोहब्बत हूँ" मेरे बा'द दुनिया का क्या होगा कि मैं तो मोहब्बत हूँ मैं शबरी के जूठे लबों से राम के पेट तक जाता बैर हूँ जिस के लिए कृष्ण ने शाही भोजन ठुकराया मैं विदुर का कुबेर हूँ मैं हर बार आता हूँ पर जहाँ मुझे पहचान नहीं पाता अगर पहचान भी ले प्रीत तो ठीक से जान नहीं पाता कहीं रोमियो-जूलियट के मरकज़ की दीवार हूँ जिसे खोदता हुआ फ़रहाद मर गया नहर का वो पार हूँ जिस के किनारों पर सागर-ए-सहरा है जिस में कोई क़ैस मजनू हो कर गाम-ब-गाम भटक रहा है लैला की कलाई हूँ मैं ख़य्याम की रूबाई हूँ मैं नज़्म-ए-फ़ैज़ हूँ मैं सब सेे तेज़ हूँ मैं सय्याद हूँ चाक-ए-क़फ़स हूँ जिस्म-ओ-दिल के दरमियाँ हूँ इश्क़ हूँ हवस हूँ बे-वफ़ाई का ख़ुदा हूँ वफ़ादारों का पीर हूँ सब मुझ सेे रहाइश-पज़ीर हैं और मैं सबका असीर हूँ मुझ से सब की ये हालत है मैं हालात से पशेमाँ हूँ मैं दस्त-ए-ज़ुलेखा भी हूँ मैं ही चाक-गरेबाँ हूँ मैं मीर-ओ-ग़ालिब की ग़ज़ल हूँ कीचड़ हूँ कमल हूँ जो मेरे अंदर उतरे कभी बाहर न आने पाए कि मैं तो दलदल हूँ मैं हीर-राँझा के मरकज़ हिज्र हूँ महबूब की गाली हूँ माँ की फ़िक्र हूँ मैं वो लफ़्ज़ जिसे सुन कर शाह भरी महफ़िल औरत का पैरहन उतरता है मैं वो दुआ जिसे पढ़ने पर कोई कृष्ण आ के उसे बचाता है मैं वो अल्फ़ाज़ जिसे गा कर जवान सरहद पार से प्रेमिका को पुकारता है मैं वो कंगन जो विधवा के लिए विरह के गीत गाता है मैं श्रृंगार मैं ही विरह गीत हूँ दुनिया शाइ'र जाने मुझ को लेकिन मैं तो प्रीत हूँ मेरी दुनिया को चाहत है कि मैं रस्म-ए-अदावत हूँ आज़ाद की गोली हूँ भगत सिंह की बग़ावत हूँ मेरे बा'द दुनिया का क्या होगा कि मैं तो मोहब्बत हूँ — Pritesh Bunker
"याद मेरी आएगी" जब दुनिया अपना रंग दिखाएगी जब तुम्हें वफ़ा समझ आएगी जब सब छोड़ कर जा रहे होंगे जब तुम्हारी आँखें भर आएँगी तुम्हें याद आएगी मेरी जब सब कुछ तबाह हो जाएगा साँसें थमने को होंगी तुम्हारी तुम्हें याद आएगी मेरी अन्तिम क्षणों में सिसकियाँ भर रही होगी मन ही मन रो रही होगी किसी से जब कुछ न कह पाओगी अपना दर्द न जाता पाओगी जब कोई न होगा हमदर्द तुम्हारा जब न होगी किसे परवाह तुम्हारी तुम्हें याद आएगी मेरी याद मेरी क़यामत है इक न इक दिन तो आएगी ही जो आज इतना हँस रहे हो ना देखना इक दिन रुलाएगी ही हमें रुला कर तुम हँसते हो अरे जनाब मूर्ख बनते हो देखना ये क़ुदरत इक दिन तुम्हें सताएगी, तड़पाएगी ये दुनिया जब अपना नकाब हटाएगी तुम्हें याद मेरी आएगी — Pritesh Bunker
"घर उस का" सिरहाना ऊँचा होगा वहाँ चादर भी मखमली होगी फिर उस के बिस्तर पर तुम्हें नींद क्यूँ नहीं आती? घर उस का मेरे घर से कई ज़्यादा महंगा है, बड़ा है फिर तुम वहाँ चैन से क्यूँ नहीं रह पाती वो दौलतमंद है, बड़ा आदमी है तुम वहाँ ख़ुश रहोगी मैं एक शाइ'र हूँ, पूरा कंगाल हूँ मेरे घर आ कर क्या करोगी! रोज़ ही कुछ नया तुम्हें वहाँ खाने मिलेगा घर में मेरे दो वक़्त की रोटी भी नसीब ना हो सब कुछ दे सकता है तुम्हें वो मेरे पास प्यार के सिवा देने को कुछ भी नहीं ये बात तुम क्यूँ नहीं समझ पाती! घर उस का घूमने का शौक है ना तुम्हें वो दुनिया भर में घुमा सकता है औकात है उस की जो चाहिए तुम्हें ला कर दे सकता है औकात है उस की मेरी औकात तो तुम्हें पता ही है मेरे एक हाथ में क़लम, दूसरे में दवाई है हर पल बीमार रहता हूँ ये तुम भी जानती हो मेरी लाचारी, बेबसी को तुम भी तो पहचानती हो क्या पता मैं कब मर जाऊँ और इल्ज़ाम तुम्हारे सर आए इस से पहले मुझे छोड़ कर क्यूँ तुम चली नहीं जाती — Pritesh Bunker