गिनती के चार दिन हयात के हैं

बाक़ी जितने बचे वफ़ात के हैं

आप की माने भी तो हम क्यूँकर
आप साहिब कब अपनी बात के हैं

नाम मेरा लिखा हुआ है पर
रंग मेहँदी में और हाथ के हैं

ये जो बिस्तर पे लाश हो रखे हैं
ये सभी गुल सुहागरात के हैं

वो भले हैं तो होंगे मुझ को क्या
ये बुरे हैं प मेरी ज़ात के हैं

— Pritesh Bunker

More by Pritesh Bunker

Other ghazal from the same pen

See all from Pritesh Bunker →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling