"ख़्वाब"

सौ सदियों में सिर्फ़ इक दफ़ा
जब तुम मुझ से मिलने आई थी
अचानक से
गुल खिलने लगे थे
सहरा में बारिश छाई थी

उस दिन
आफ़ताब शब में रौशन हुआ था
क़मर आग की लपटों में जल रहा था
जैसे हमारा इश्क़ जल रहा था
जिस ने पिघला दिया था
सारे हिमालय को
और सारे समंदरों को ख़ुश्क कर दिया था

ये प्रलय का दिन था
ये हक़ीक़त का दिन था
उस दिन पहली मर्तबा
सब जागे हुए थे
पहली बार था कि
सब अपने ख़्वाब से बाहर आए थे

या रब
ये ख़्वाब कितना हसीन था

— Pritesh Bunker

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