मैं ग़ज़ल का बदन सँवारता हूँजब तुम्हें पन्नों पर उतारता हूँवहाँ तक जाती नइँ कोई आवाज़सो उसे चीख कर पुकारता हूँरंगों से दोस्ती नहीं रखताऔर फूलों पे जान वारता हूँतेरे क़दमों में रख के सिर अपनापैर आकाश में पसारता हूँख़्वाब में जौन एलिया होकरनींद में फ़ारिहा पुकारता हूँ— Pritesh Bunker