Vashu Pandey

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    ये लगभग ग़ैर-मुमकिन है ख़ुदाया पर निकल जाए
    चरागों के दिमाग़ों से हवा का डर निकल जाए

    इसी डर से सफ़र भर में कहीं आँखें नहीं झपकी
    कहीं ऐसा न हो ग़लती से तेरा घर निकल जाए

    तरीक़ा एक ही है बस सुकूँ पाने का दुनिया में
    यहाँ से दिल निकल जाए यहाँ से सर निकल जाए
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    तुम्हें कैसा लगेगा गर किसी पिंजरे में रख कर के
    कोई तुमसे कहे तेरी हिफ़ाज़त कर रहे हैं हम
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    इतने कहाँ नसीब कि इससे प्यास बुझाएँ खेल करें
    दरिया हम जैसों को अपने पास बिठा ले काफ़ी है
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    अपना पूरा ज़ोर लगा कर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद
    नफ़रत की दीवार गिराकर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद

    इश्क़ के मुनकिर पूछ रहे हैं पहले गर्दन देगा कौन
    अब तो दोनों हाथ उठाकर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद

    तेरी चुप्पी ये साबित कर देगी कि तू बुज़दिल है
    वरना आँख से आँख मिलाकर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद

    इस धरती से उस अम्बर तक एक ही नारा गूँजेगा
    मेरे संग आवाज़ मिलाकर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद
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    हर मंज़र पर जश्न मनाने नाचने गाने वाले लोग
    इक मुद्दत से चुप बैठे हैं शोर मचाने वाले लोग

    हम दोनों को समझाऍंगे डॉंटेंगे फटकारेंगे
    हम दोनों को कब समझेंगे ये समझाने वाले लोग

    इश्क़ क़ैस फरहाद रोमियो जैसे ही कर सकते हैं
    हम तो ठहरे दस से छह तक ऑफिस जाने वाले लोग

    कुछ चीज़ों का इस दुनिया में कोई नेमुल बदल नहीं है
    कैसे चाँद से काम चलाऍं तुझ को देखने वाले लोग
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    इतने गहरे उतर गया हूँ दरिया-ए-दर्द-ए-दिल में
    हाथ पकड़ कर खींच ले वरना डूब के भी मर सकता हूँ

    कट्टे ख़ंजर रस्सी माचिस कुछ दिन मुझसे दूर रखो
    कुछ करने से चूक गया हूँ मैं कुछ भी कर सकता हूँ
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    बड़े बुज़दिल हैं लेकिन फिर भी हिम्मत कर रहे हैं हम
    तुम्हारे शहर में रह कर मोहब्बत कर रहे हैं हम

    अभी तक ठीक से आयी नहीं है धुन मोहब्बत की
    गुज़िश्ता सात जन्मों से रियाज़त कर रहे हैं हम

    तुम्हें कैसा लगेगा गर किसी पिंजरे में रख कर के
    कोई तुमसे कहे तेरी हिफ़ाज़त कर रहे हैं हम

    वगरना जिसको छोड़ा है, उसे मुड़कर नहीं देखा
    ग़नीमत जान के तुझसे शिकायत कर रहे हैं हम

    मेरे रोने से ख़ाहिफ़ हैं मगर क्या इससे वाक़िफ़ हैं
    कि ये मातम भला किस की बदौलत कर रहे हैं हम
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    यूँ भी कटने लगा हूँ अब मैं ग़ैर-मुनासिब यारों से
    बारिश वफ़ा नहीं कर सकती मिट्टी की दीवारों से

    दुखे हुए लोगों की दुखती रग को छूना ठीक नहीं
    वक़्त नहीं पूछा करते हैं यारों वक़्त के मारों से

    आशिक़ हैं तो आशिक़ वाले जलवे भी दिखलाएँ आप
    कपड़े फाड़ें ख़ाक़ उड़ाएँ सर मारें दीवारों से

    और चमन गर अपना है तो इसका सबकुछ अपना है
    बेशक फूल पे फूल लुटाएँ ख़ार न खाएँ ख़ारों से
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    रात-रात भर जगने वाले तेरी ख़ैर
    आसमान को तकने वाले तेरी ख़ैर

    उसकी सब तस्वीरें घर से बाहर फेंक
    ख़ुद दीवार से लगने वाले तेरी ख़ैर

    वक़्त हमेशा एक सा थोड़ी रहता है
    मेरे ऊपर हँसने वाले तेरी ख़ैर

    वो ख़त में आयात लिखा करती थी और
    लिखती थी कि पढ़ने वाले तेरी ख़ैर
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    आप जो ठीक समझते हैं वो करिए साहब
    ऐसे मौसम में मैं दफ़्तर तो नहीं आ सकता
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