यूँँ भी कटने लगा हूँ अब मैं ग़ैर-मुनासिब यारों से
बारिश वफ़ा नहीं कर सकती मिट्टी की दीवारों से
दुखे हुए लोगों की दुखती रग को छूना ठीक नहीं
वक़्त नहीं पूछा करते हैं यारों वक़्त के मारों से
आशिक़ हैं तो आशिक़ वाले जलवे भी दिखलाएँ आप
कपड़े फाड़ें ख़ाक़ उड़ाएँ सर मारें दीवारों से
और चमन गर अपना है तो इसका सबकुछ अपना है
बेशक फूल पे फूल लुटाएँ ख़ार न खाएँ ख़ारों से
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Vashu Pandey
our suggestion based on Vashu Pandey
As you were reading Environment Shayari Shayari