याद में तेरी शब भर तड़पा नहीं रहा
हाए तेरा वो आशिक़ ज़िंदा नहीं रहा
मरने से ये एक सहूलत मिली हमें
कम से कम अब जान का ख़तरा नहीं रहा
आँगन में बस इक दीवार उठी और फिर
घर में कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा
तुम को छत का रोना है और उन का क्या
जिन के ऊपर बाप का साया नहीं रहा
— Vashu Pandey















