jab vo milne kamre tak ko aata hai | जब वो मिलने कमरे तक को आता है

  - Zubair Alam

जब वो मिलने कमरे तक को आता है
घर मेरा फिर जन्नत सा हो जाता है

नींद कहाँ रह जाती है फिर आँखों में
चाँद किसी टहनी पे जब टिक जाता है

जिस मौसम में भीगना है हम दोनों को
उस मौसम में पूछ रही हो छाता है

छोड़ चलो इस बस्ती को इस बस्ती में
कौन कहाँ किस का किस से अब नाता है

चौदहवीं को छत पे तुम्हें जब तकता हूँ
चाँद भी जल जल के सूरज हो जाता है

  - Zubair Alam

Sooraj Shayari

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