लोग दरिया में यूँँ ही उतर जाते है
दिन गुज़ारे अगर तो गुज़र जाते हैं
ये न हो फिर बहुत पीछे रह जाएँ वो
इस लिए कुछ क़दम पर ठहर जाते हैं
उँगलियाँ फेर कर देखिएगा कभी
गेसुओं की तरह हम सँवर जाते हैं
यूँ भी घर से निकल जाते हैं बेवजह
ताकि पूछे वो सुनिए किधर जाते हैं
इश्क़ स्कूल ही की तरह है जहाँ
कुछ बिगड़ जाते हैं कुछ सुधर जाते हैं
काम पर आते हैं लाख इरादों से हम
एक उम्मीद से अपने घर जाते हैं
हर ख़बर आप तक जा नहीं पाएगी
बिन बताए भी कुछ लोग मर जाते हैं
— Aditya Singh aadi














